सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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कितना प्रयत्नशील था । परन्तु इस प्रकार का यन्त्र बनाना सुगम नहीं था । इसी-
लिये भास्कराचार्य १ जी ने इसकी उपेक्षा की है ।
नरयन्त्र—
नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ ।
छाया संसाधनेः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् ॥२४॥
अनुवाद—इसी प्रकार नरयन्त्र अथवा शङ्कु दिन में जब सूर्य स्वच्छ हो
अच्छा होता है । छाया की ठीक-ठीक नाप से समय का ठीक-ठीक ज्ञान करने की
रीति बतलायी गयी है ।
विज्ञान-भाष्य—त्रिप्रश्नाधिकार में यह विस्तारपूर्वक बतलाया गया है कि
१२ अंगुल लम्बे शंकु की छाया से दिशा, देश और काल की गणना कैसे की
जाती है ।
उपसंहार—
ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः ।
ग्रहलोकमवाप्नोति पययिणात्मवान् नरः ॥२५॥
इति सूर्य-सिद्धान्ते ज्योतिषोपनिषदध्याय
अनुवाद—ग्रह और नक्षत्रों की चाल तथा गोल गणित के तत्व को जानने
वाला मनुष्य ग्रहलोक को प्राप्त होता है और जन्मान्तर में आत्मज्ञानी होता है ।
विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक से यह प्रकट होता है कि हमारे आचार्य
ज्योतिष-शास्त्र के तत्व की जानकारी का कितना महत्व समझते थे और इसका प्रत्यक्ष
बोध कराने के लिये अनेक प्रकार के यन्त्रों की कैसी रचना करते थे । आजकल यन्त्रों
की इतनी उन्नति हो गयी है कि इनके द्वारा आकाशीय पिंडों की गति का साधन
बड़ी सूक्ष्मता से किया जा सकता है । इसमें अध्याय में ऐसे एक यन्त्र की चर्चा
संक्षेप में की जाती है । जिनको इनके सम्बन्ध में विशेष रीति से जानने की इच्छा
हो उन्हें प्रकाश-विज्ञान की पुस्तकें पढ़नी चाहिए ।
दूरदर्शक—इस यन्त्र से दूर की वस्तुओं का प्रतिबिम्ब बहुत बड़ा और
स्पष्ट देख पड़ता है । इसका सिद्धान्त संक्षेप में यह है :—
पीतल की नलिका के एक सिरे पर ऐसा ताल रहता है जिससे दूर की वस्तु
का प्रतिबिम्ब उसकी नाभी पर या इसके पास ही बनता है । इस प्रतिबिम्ब के पास
१. अत्र दशभिः शुल्बस्य पलैरित्यादि यद् घटी लक्षणम् कैश्चित् कृतं
तद्युक्ति शून्यं दुर्घटं चेत्ये तदुपेक्षितम् । (गोलाध्याय, यन्त्राध्याय श्लोक ८ की
व्याख्या) ।