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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

५६ सूर्य सिद्धान्त
लम्बज्याघ्नस्त्रिज्योवाप्तस्फुटो भूपरिधिः स्वकः ।
तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ॥६०॥
कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः प्रविशोधयेत् ।
रेखाप्रतीची संस्थानां प्रक्षिपेत्तु स्वदेशजम् ॥६१॥
अनुवाद—(६०) भूपरिधि को (अपने स्थान की) लम्बज्या से गुणा करके
त्रिज्या से भाग देने पर अपने स्थान की स्फुट परिधि निकलती है । अपने स्थान के
देशान्तर योजना को ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके गुणनफल को इसी स्फुट
परिधि से भाग देना चाहिये । (६१) (यदि दैनिक गति कला में ली गयी है तो) फल
कला में आवेगा । यदि अपना स्थान लंका से पूरब में हो तो लंका की अर्द्धरात्रि के
समय के मध्यमग्रह में से इस फल को घटाना चाहिये और यदि अपना स्थान लंका से
पच्छिम में हो तो जोड़ना चाहिये । ऐसा करने से अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय
के मध्यम ग्रह (ग्रहों के मध्यम स्थान) निकल आते हैं ॥६०-६१॥
विज्ञान भाष्य—बीज-गणित के अनुसार इन श्लोकों को इस प्रकार प्रकट
कर सकते हैं :—
भूपरिधि × लम्बज्या
स्फुट परिधि = ——————————— (१)
त्रिज्या
देशान्तर } देशान्तर योजन × ग्रह की दैनिक गति (कला में)
फल } = —————————————————————— (२)
स्फुट परिधि
अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यम ग्रह
= लंका की अर्द्धरात्रि के मध्यम ग्रह ± देशान्तर फल . (३)
यदि स्थान लंका से पूरब हो तो ऋणात्मक चिह्न और पच्छिम हो तो
धनात्मक चिह्न लेना चाहिये ।
इसकी उपपत्ति समझने के लिए पहले यह जानना चाहिये कि लम्बज्या, स्फुट
परिधि, देशान्तर इत्यादि क्या हैं ?
ज्या—यदि किसी समकोण त्रिभुज के किसी भुज की लम्बाई को उसके कर्ण
की लम्बाई से भाग दे दिया जाय तो लब्धि उस भुज के सामने के कोण की ज्या
कहलाती है । चित्र ८ में स भा भ एक समकोण त्रिभुज है; इसलिए इसके स भ भा
कोण की ज्या = सभा / सभ और भ स भा कोण की ज्या = भभा / सभ । समकोण त्रिभुज के