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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 838 में से

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पृष्ठ 726

एकादश अध्याय
पाताधिकार
(संक्षिप्त वर्णन)
[श्लोक १-२—वैधृति और व्यतीपात पातों की परिभाषा। श्लोक ३-५—
दोनों पातों का स्वरूप और प्रभाव । श्लोक ६—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब
निश्चय करे । श्लोक ७-८—यह जानना कि पातकाल बीत चुका है अथवा होने-
वाला है। श्लोक ६-११—सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ कब समान होती हैं ।
श्लोक १२-१३—स्पष्ट क्रान्ति से शुद्ध पातकाल जानना । श्लोक १४-१५—पातकाल
का आरम्भ, मध्य और अंत कब होता है। श्लोक १६-१८—पातकाल में. क्या
करना चाहिये । श्लोक १६—पात दो बार कब होते हैं, और अभाव कब होता
है । श्लोक २०—पंचांग संबंधी व्यतीपात योग जानना । श्लोक २१—भसंधि और
गंडांत काल की परिभाषा । श्लोक २२—पात और गंडांतकाल किस लिए निषिद्ध
हैं श्लोक २३—उपसंहार ।]
इस अधिकार में गणितज्योतिष के साथ साथ फलितज्योतिष का भी
समावेश है। यही इसकी विशेषता है। दूसरी विशेषता यह है कि इसके बाद जो
तीन अध्याय आवेंगे उनका नाम 'अधिकार' नहीं है वरन् 'अध्याय' है। इस अधिकार
में जिन पातों की चर्चा है उनको महापात भी कहते हैं।
वैधृति और व्यतीपात की परिभाषा—
एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा ।
तद्यु तौ मण्डशे क्रान्त्योः तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥
विपरीतायनगतौ चन्द्रार्कौ क्रान्तिलिप्तिकाः ।
समस्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतौः ।।
अनुवाद—(१) जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में होते हैं और जब इनके
भोगांशों का योग १२ राशि के समान होता है तब दोनों की क्रान्तियाँ समान होने
से वैधृति नामक पात होता है। (२) जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों में होते हैं
और जब इनके भोगांशों का योग ६ राशि के समान होता है तब इनकी क्रान्तियाँ
समान होने से व्यतीपात नामक पात होता है।