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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६९६ सूर्य-सिद्धान्त
भूमि या पट्टी है जिस पर परिलेख बनाना है और बिन्दु रवि का स्थान है (देखो
चित्र ११७) । यदि ६-८ श्लोकों के अनुसार जाने हुए भुज का मान र भ के समान
चित्र ११७
हो और इसकी दिशा दक्षिण हो तो र बिन्दु से दक्षिण ओर, और उत्तर हो तो
उत्तर की ओर र भ के समान एक रेखा खींचो जिसका भ सिरा भुज-अग्र कहा
जा सकता है । इस भुज-अग्र से पच्छि की ओर कोटि के समान अर्थात् १२ अंगुल
के समान एक रेखा च तक खींचो । इस च बिन्दु को कोटि-अग्र कहते हैं और इसी
को तात्कालिक चन्द्रबिम्ब का केन्द्र समझना चाहिए । र च रेखा को कर्ण कहते हैं
जिसकी चर्चा आठवें श्लोक में की गयी है । च को केन्द्र मानकर तात्कालिक चन्द्रबिम्ब
के व्यासार्ध च पर एक वृत्त खींचो जो परिलेख में चन्द्रबिम्ब सूचित करता है ।
कर्ण-रेखा को इतना बढ़ाओ कि वह चन्द्रबिम्ब के दूसरी ओर प तक पहुँच जाय ।
च बिन्दु से जाती हुई एक लम्ब रेखा प पू पर खींचो जो चन्द्रबिम्ब के उ, द
बिन्दुओं पर पहुँचे । इन उ, पू, द, प बिन्दुओं को चन्द्रबिम्ब की क्रमानुसार उत्तर,
दक्षिण और पच्छिम दिशाएँ समझो । नौवें श्लोक के अनुसार आये हुए
चन्द्रमा के शुक्ल भाग का जो परिमाण हो पू से उतनी ही दूरी पर च की ओर
एक बिन्दु छ रखो । उ छ द बिन्दुओं से होता हुआ जो धनु खींचा जायगा वही