सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 719, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें६६४ सूर्य-सिद्धान्त
समान होता है और लघु अक्ष सदैव परिवर्त्तनशील । अब यह बतलाया जायगा कि
सूर्य और चन्द्रमा के स्थानों के अनुसार शुक्ल भाग की वृद्धि या क्षीणता किस प्रकार
होती है।
मान लो कि च चन्द्रमा का केन्द्र, च द द्रष्टा की दिशा, क ख ग घ चन्द्र
बिम्ब का वह तल जो द्रष्टा की दिशा से समकोण पर है, च र सूर्य की दिशा और
ख ज घ चन्द्रबिम्ब का वह तल है जो च र दिशा से समकोण पर है। चन्द्र-पृष्ठ
का जो खण्ड ख क घ और ख ज घ वृत्तार्धों के बीच में है वही चन्द्रबिम्ब का शुक्ल
भाग है जो द्रष्टा को देख पड़ता है। परन्तु ख ज घ वृत्तार्ध को द्रष्टा तिरछा देखता
है इसलिए यह क ख ग घ तल पर प्रलम्बित (projected) होकर दीर्घ वृत्तार्ध ख ट घ
के रूप में देख पड़ता है। यही दीर्घवृत्तार्ध ख ट घ चंद्रबिम्ब के शुक्ल भाग की
भीतरी सीमा है। यहाँ च ज चंद्रगोल की त्रिज्या है इसलिए च क के समान है और
च ट च ज का छेद्य है इसलिए
च ट = च ज कोज्या ज च ट
= च क कोज्या र च चा
क्योंकि कोण ज च ट चंद्रमा के उन तलों के बीच का कोण है जो द्रष्टा और सूर्य की
दिशाओं से समकोण पर हैं इसलिये यह द्रष्टा की दिशा द च चा और सूर्य की दिशा
च र के बीच के कोण र च चा के समान है। इसलिए
ट क = च क - च ट
= च क - च क कोज्या र च चा
= च क (१ - कोज्या र च चा)
= च क उत्क्रमज्या र च चा
कोण र च चा का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि त्रिभुज द च र
का यह बहिःकोण है और इसके तीन भुज द च, च र और द र क्रमानुसार द्रष्टा से
चंद्रमा, चंद्रमा से सूर्य और द्रष्टा से सूर्य की दूरियां हैं जो ज्ञात हो सकती हैं।
इस प्रकार यह सिद्ध है कि शुक्ल भाग का मान तिथि-वृद्धि के अनुपात के
अनुसार नहीं बढ़ता जैसा कि नौवें श्लोक में बतलाया गया है क्योंकि किसी कोण
की उत्क्रमज्या का मान उस कोण की वृद्धि के अनुपात से नहीं बढ़ता, जैसे यदि कोण
दूना हो जाय तो उसकी उत्क्रमज्या भी दूनी नहीं हो जाती (देखो पृष्ठ १२०) ।
शृङ्गोन्नति जानने का परिलेख—
दत्त्वार्कसंज्ञितं बिन्दुं ततो बाहुं स्वदिक्मुखम् ।
ततः पश्चान्मुखं कोटिं कर्णं कोट्यग्रमानुगम् ॥११॥