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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 712, कुल 838 में से

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पृष्ठ 712

शृङ्गोन्नत्यधिकार ६८७
सातवें और आठवें श्लोक के पूर्वार्ध के अनुसार
प × चन्द्रछायाकर्ण ± १२ अक्षज्या
भुज = -----------------------------------
लम्बज्या
कोटि = चन्द्रमा का शंकु अर्थात् चन्द्रमा की नतांशकोटिज्या
∴ कर्ण = √ भुज^२ + कोटि^२
छठें श्लोक में यह बतलाया गया है कि सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियों के
अन्तर या योग की ज्या को लेकर सातवें श्लोक के अनुसार काम करना चाहिये परन्तु
यह नियम तभी लागू हो सकता है जब सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तियाँ बहुत कम हों
क्योंकि किसी कोण और उसकी ज्या में अन्तर तभी बहुत कम होता है जब उस
कोण का मान कम हो। इसीलिये अनुवाद में क्रान्तियों के योग या अन्तर की जगह
क्रान्तिज्याओं का योग या अन्तर कहा गया है।
इसी तरह सातवें श्लोक के पूर्वार्ध में 'मध्याह्नेन्दुप्रभाकर्ण' कहा गया है
जिसका अर्थ है मध्याह्नकालिक चन्द्रमा का छायाकर्ण, परन्तु यह युक्तियुक्त नहीं
जान पड़ता इसलिए इसकी सूर्यास्तकालिक अथवा जिस समय की शृङ्गोन्नति जाननी
हो उस समय का चन्द्रमा का छायाकर्ण ही समझना उचित है। स्वामी विज्ञानानन्द
जी तथा आचार्य रङ्गनाथ जी ने भी इसका अर्थ यही किया है और बतलाया है कि
यदि एक सूर्योदय तक से दूसरे के समय को १ दिन माना जाय तो सूर्यास्त का समय
मध्याह्न कहा जा सकता है। परन्तु मध्याह्न का शब्द यहाँ भ्रमात्मक है क्योंकि मध्याह्न
का साधारण अर्थ १२ बजे दिन का ही लिया जाता है। इसलिए श्लोक में मध्याह्न
शब्द उचित नहीं है।
उपपत्ति—सूर्यास्तकाल में सूर्य से चन्द्रमा का जो रेखात्मक अन्तर होता
है उसी को यहाँ कर्ण कहा गया है और उसी को जानने की रीति बतलायी गयी
है। सूर्यास्त काल में चन्द्रमा आकाश में जिस बिन्दु पर हो उसका धरातल से जो
लम्बान्तर (perpendicular distance) होता है उसे ही यहाँ कोटि कहा गया है
परन्तु यह भारतीय प्रथा के अनुसार उन्नतांशज्या अथवा नतांश-कोटिज्या के समान
होता है और नतांश-कोटिज्या का दूसरा नाम शंकु भी है (देखो पृष्ठ २८२) इस-
लिए कोटि को शंकु कहा गया है। इसी कोटि के आधारबिंदु से सूर्य का जो
रेखात्मक अंतर धरातल पर होता है उसे ही भुज या बाहु कहा गया है जिसको
जानने की रीति श्लोक ६, ७ और ८ के पूर्वार्ध में बतलायी गयी है।
यहाँ एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए। इस नियम से तभी काम
लिया जा सकता है जब सूर्यास्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा को यामोत्तरवृत्त के तल
(plane) में समझ लिया जाय अर्थात् चन्द्रमा द्रष्टा से जिस दिशा में हो उसे दक्षिण