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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४८ सूर्य्य सिद्धान्त
एक चक्र में ६० सम्वत्सर होते हैं जिनके नाम क्रम से यह हैं :—
१ विजय २१ प्रमादी ४१ श्रीमुख
२ जय २२ आनन्द ४२ भाव
३ मन्मथ २३ राक्षस ४३ युवा
४ दुर्मुख २४ अनल (नल) ४४ धाता
५ हेमलम्ब २५ पिंगल ४५ ईश्वर
६ विलम्ब २६ कालयुक्त ४६ बहुधान्य
७ विकारी २७ सिद्धार्थी ४७ प्रमाथी
८ शार्वरी २८ रौद्र ४८ विक्रम
९ प्लव २९ दुर्मति ४९ वृष
१० शुभकृत ३० दुंदुभी ५० चित्रभानु
११ शोभन ३१ रुधिरोद्गारी ५१ सुभानु
१२ क्रोधी ३२ रक्ताक्ष ५२ तारण
१३ विश्वावसु ३३ क्रोधन ५३ पार्थिव
१४ पराभव ३४ क्षय ५४ व्यय
१५ प्लवंग ३५ प्रभव ५५ सर्वजित
१६ कीलक ३६ विभव ५६ सर्वधारी
१७ सौम्य ३७ शुक्ल ५७ विरोधी
१८ साधारण ३८ प्रमोद ५८ विकृति
१९ विरोधकृत ३९ प्रजापति ५९ खर
२० परिधावी ४० अंगिरा ६० नन्दन
वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में¹ संवत्सर चक्र का आरंभ विजय से न मानकर
३५वें सम्वत्सर प्रभव से माना है। यही प्रथा आजकल भी प्रचलित है। यह प्रथा
कब से आरंभ हुई इसकी खोज करना आवश्यक है। ६० संवत्सरों के चक्र में कई
छोटे-छोटे विभाग हैं जिनका आरंभ भी प्रभव से ही होता है। इनकी चर्चा मानाध्याय
नामक अंतिम अध्याय में की जायगी ।
१. नवलकिशोर प्रेस से १८८४ ई० में प्रकाशित और पं० दुर्गाप्रसाद जी
द्वारा अनुवादित पृष्ठ ६०—
आद्यं धनिष्ठांशमभिप्रपन्नो माघे यदायात्युदयं सुरेज्यः ।
षष्ठ्यब्द पूर्वंः प्रभवः सनाम्ना प्रवर्तते भूतहितास्तदाब्दः ॥