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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 838 में से

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पृष्ठ 709

६८४ सूर्य-सिद्धान्त
प्रक्षिप्त कह कर उड़ा देना और इसका अर्थ ही न करना उचित नहीं है क्योंकि यदि
यह प्रक्षिप्त हो तो भी अनुचित नहीं है क्योंकि इसके अनुसार गणना न करने से तो
चन्द्रमा के अस्त काल में १ घड़ी या २४ मिनट तक का अन्तर पड़ सकता है।
आचार्य रङ्गनाथजी ने अपनी टीका १५२५ शाके १ में की थी इसलिए यह विवाद
कई सौ वर्ष पहले का है कि यह प्रक्षिप्त है या नहीं । मैं यह बतलाना चाहता हूँ कि
इन श्लोकों का क्या अर्थ है । श्लोक २ के पूर्वार्ध में तो संक्षेप में उदयास्ताधिकार
के चौथे और पाँचवें श्लोकों में बतलाये गये नियम की ओर संकेत है जो बिल-
कुल ठीक है । उत्तरार्ध में यह बतलाया गया है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा एक ही
राशि में हों तो इन दोनों के दृक्कर्म-संस्कृत-भोगांशों के अन्तर को ही कलांश समझ
कर जान लेना चाहिए कि सूर्यास्त के उपरांत कितने समय पर चन्द्रमा का अस्त
होगा । इसका कारण यह जान पड़ता है कि जब चन्द्रमा सूर्य से इतने थोड़े अन्तर
पर रहता है कि ये दोनों एक ही राशि में हों तब इनके लग्नान्तरासुओं में जो अन्तर
होता है वह इनके भोगांशों के अंतर से बहुत भिन्न नहीं होता इसलिए सुगमता के
लिए यह स्थूल नियम बतला दिया गया है ।
इसके बाद श्लोक ३ में असकृत्कर्म (approximation) से चन्द्रमा का अस्त-
काल सूक्ष्मतापूर्वक जानने की रीति बतलायी गयी है । इसका कारण यह है कि दूसरे
श्लोक के पूर्वार्ध के अनुसार चन्द्रमा के अस्तकाल का जो समय आता है वह ठीक
नहीं होता क्योंकि चन्द्रमा की गति बहुत तीव्र होती है इसलिए सूर्य के अस्तकाल में
चन्द्रमा का जो भोगांश होता है उससे चन्द्रमा के अस्तकाल का भोगांश कुछ बढ़
जाता है जिससे वह कुछ देर में अस्त होता है । सूर्य से चन्द्रमा जितना ही अधिक दूर
रहता है उसीके अनुपात में चन्द्रमा के अस्त होने में बिलम्ब लगता है । शुक्ल पक्ष
की त्रयोदशी या चतुर्दशी के दिन तो यह बिलम्ब २० मिनट के लगभग हो जाता है
क्योंकि इस दिन सूर्यास्त से १०, ११ घण्टे से भी अधिक समय में चन्द्रमा का अस्त
होता है और इतने समय में इसकी गति ५, ६ अंश के लगभग होती है जिससे इसके
अस्त होने में २० से २४ मिनट तक का विलम्ब हो सकता है । यही जानने के लिए
कहा गया है कि सूर्य और चन्द्रमा में ६ राशि जोड़ने से जो लग्नान्तरासु आवे उसकी
घटिका बनाकर अर्थात् असुओं को ६ से भाग देकर पल और पलों को ६० से भाग
देकर घड़ी बनाकर इसको सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक गतियों से गुणा कर दे और
गुणनफल को ६० से भाग दे दे तो यह मालूम हो जायगा कि लग्नान्तरासुओं में सूर्य
और चन्द्रमा में कितनी गति हुई । क्योंकि जब ६० घड़ी में सूर्य और चन्द्रमा की
१. देखो बेंकटेश्वर प्रेस का सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ २४६