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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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ग्रहयुत्यधिकार ५६६
दिये गये हैं । उनसे यह प्रगट होता है कि बिम्बों का परिमाण लम्बन के अनुसार
बदलता है अर्थात् यदि लंबन अधिक होता है तो स्पष्ट बिम्ब भी अधिक होता है
और लंबन कम होता है । तो स्पष्ट बिंब कम होता है । परन्तु लंबन का परिमाण
दूरी के विलोम अनुपात के अनुसार बदलता है अर्थात् जब दूरी अधिक हो जाती है
तब लम्बन कम हो जाता है और जब दूरी कम हो जाती है तब लंबन अधिक हो
जाता है (देखो पृष्ठ ३८५) ।
चित्र ३४ (देखो पृष्ठ १८३) से प्रकट हैं कि जिस समय ग्रह का शीघ्र केन्द्र
शून्य होता है उस समय पृथ्वी से ग्रह की दूरी अत्यन्त अधिक होती है अर्थात् उस
समय ग्रह का शीघ्र कर्ण अत्यन्त अधिक होता है तथा यह पृथ्वी से सूर्य की दूरी
और सूर्य से ग्रह की दूरी के योग के समान होता है । परन्तु जिस समय ग्रह का
शीघ्र केन्द्र १८० अंश होता है उस समय पृथ्वी से ग्रह की दूरी अत्यन्त कम होती
है तथा यह पृथ्वी से सूर्य की दूरी और सूर्य से ग्रह की दूरी के अंतर के समान होती
है । ग्रह के शीघ्रकर्ण और बिम्बों का संबंध पिछले पृष्ठ की सारणी से अच्छी तरह
प्रकट होता है ।
यहाँ पृथ्वी से सूर्य की दूरी अथवा सूर्य का शीघ्रकर्ण १००० माना गया है ।
युतिकाल में ग्रहों को बेध करने की गति—
छायां भूमौ विपर्यस्ते स शङ्क्वग्रे प्रदर्शयेत् ।
ग्रहः स्वदर्पणान्तस्थ शंव्वग्रे सम्प्रदृश्यते ॥ १५॥
पञ्चहस्तोच्छ्रितौ शङ्क यथा दिग्भागसंस्थितौ ।
ग्रहान्तरकलाक्षिप्तौ अधोहस्तनिखातितौ ॥१६॥
कर्णं सूत्रे तथा दद्याच्छायाग्राच्छङ्कुमूर्धगे ।
छायाकर्णाग्रसंयोगे संस्थितस्य प्रदर्शयेत् ॥१७॥
स्वशङ्कुमूर्धगो व्योम्नि ग्रहो दृक्तुल्यतामितौ ।
अनुवाद—(१५) समतल भूमि पर जिस पर शंकु गाड़कर छाया नापी
जाती है, शंकु की जिस दिशा में ग्रह हो उसकी विपरीत दिशा में, ग्रह की युति-
कालिक छाया के अग्र में रखे हुए दर्पण में ग्रह को दिखलाना चाहिए । ऐसे दर्पण में
ग्रह शंकु की नोक के साथ मिला हुआ देख पड़ता है । (१६) पाँच हाथ के ऊँचे दो
शंकुओं को उन दिशाओं में गाड़े जिनमें युतिकाल के ग्रह हों । इन शंकुओं का परस्पर
याम्योत्तर अंतर उतना ही होना चाहिए जितना उन ग्रहों का अन्तर हो । इनको
दृढ़तापूर्वक खड़ा रखने के लिए एक-एक हाथ पृथ्वी के नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ना