सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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च ध्रुवप्रोतवृत्त का खंड है, च छ अहोरात्रवृत्त का खंड है जो ध्रुवप्रोतवृत्त से समकोण
पर होता है। गा च को भास्कराचार्यजी ने ग का स्पष्ट शर माना है और भेद
दिखलाने के लिए ग गा को मध्यम शर माना है। कोण च गा छ = कोण ध गा उ =
आक्षवलन । यदि गा विषवद्वृत्त के पास हो तो कोण ध गा उ अक्षांश के समान
माना जा सकता है। ऐसी दशा में और यदि च गा छ त्रिभुज समतल-त्रिभुज मान
लिया जाय क्योंकि ग्रह का स्पष्ट शर गा च साधारणतः बहुत छोटा होता है तब
च छ गा कोण लम्बांश के समान माना जा सकता है क्योंकि ६०° - अक्षांश =
लम्बांश । ऐसी दशा में चूंकि गोलीय त्रिभुज च गा छ में
ज्या च छ ज्या च गा
─────────── = ───────────
ज्या ∠ च गा छ ज्या च छ गा
ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन
अथवा ज्या च छ = ───────────────────────
लम्ब ज्या
परन्तु च छ का मान विषवद्वृत्त के प फ खंड के समान है जो सजातीय
त्रिभुज ध च छ और ध प फ से इस प्रकार जाना जाता है :—
ज्या प फ ज्या ध प त्रिज्या
─────── = ─────── = ─────────────
ज्या च छ ज्या ध च ज्या (६०° - च प)
त्रिज्या त्रिज्या
= ─────────────────── = ─────────────
ज्या (६०° - ग्रह की क्रान्ति) क्रान्ति कोटिज्या
⸪ ज्या प फ = ज्या च छ X त्रिज्या
──────────────
क्रान्ति कोटिज्या
ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन X त्रिज्या
= ──────────────────────────────
क्रान्ति कोटिज्या X लम्ब ज्या
यही ग्रहच्छायाधिकार के ७वें श्लोक का अर्थ है। इस प्रकार प फ का जो
मान कलाओं में आवेगा वही आक्षदृक्कर्म है ।
आक्ष और आयन दृक्कर्म किस समय जोड़ना और किस समय घटाना चाहिए
इसके लिए वही नियम हैं जो पहले सूर्य सिद्धान्त के सम्बन्ध में बतलाया गया है ।
स्पष्ट शर को जानने की एक रीति जो कुछ स्थूल है भास्कराचार्यजी ने
ग्रहच्छायाधिकार के तीसरे श्लोक में यों बतलायी है :—
ग्रह के भोगांश में तीन राशि जोड़ने से जो भोगांश आवे उसकी क्रान्ति की
कोटिज्या को अर्थात् द्युज्या को मध्यम शर से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से