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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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भूमिका
स्वामी दयानन्द ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में १८७४ ई० में विद्या-
लयों के स्नातकों के पठन-पाठन का एक समग्र पाठ्य-क्रम दिया। इस पाठ्यक्रम का
एक ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि ऋषि दयानन्द की इस आयोजना से पूर्व इस देश में
पाठ्यक्रमों की कोई सर्वांगीण पद्धति न थी। १८५८ ई० में देश में तीन विश्व-
विद्यालय खुले—कलकत्ता, मद्रास और बम्बई के। १८८८ ई० में प्रयाग और लाहौर
के दो और विश्वविद्यालय (महर्षि दयानन्द की मृत्यु के बाद) स्थापित हुए। संस्कृत
की ऐसी परीक्षायें भी, जैसे काशी की, आरम्भ नहीं हुई थीं। अतः हम निश्चय-
पूर्वक कह सकते हैं, कि ऋषि दयानन्द की समग्र पाठ्यक्रम विधि ही इस दिशा में
प्रथम प्रयास है। व्याकरणादि पढ़ने के अनन्तर ऋषि ने मनुस्मृति, वाल्मीक रामायण,
महाभारत, षड् दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद; अर्थवेद-
शिल्पादि) सिखाने की बात कही। फिर लिखा कि दो वर्ष में ज्योतिष शास्त्र, सूर्य-
सिद्धान्त, जिसमें बीजगणित, अंक, भूगोल, खगोल, और भूगर्भ विद्या हैं, इसको
यथावत् सीखें।
ज्योतिष विषयों का आदि स्रोत वेद की ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के
सूक्त १६४ का नाम अस्यवामीय सूक्त है। इस सूक्त के मन्त्रद्रष्टा ऋषि दीर्घतमस् हैं।
यह सूक्त ज्योतिष शास्त्र का प्रेरणादायक स्रोत है—
द्वादशारं न हि तज्जराय वर्वति चक्रं परि द्यामृतस्य।
आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः ॥
(ऋ० १/१६४/११)
सूर्य का चक्र जिसमें बारह अरे हैं, जो निरन्तर घूमता रहता है, कभी थकता
भी नहीं, जीर्ण भी नहीं होता, मरता भी नहीं। ७२० इसके पुत्र हैं (३६० दिन और
३६० रात्रियाँ)। अथर्ववेद में दो सूक्त उन्नीसवें काण्ड में हैं (सूक्त ७ और ८),
जिनका ऋषि गार्ग्य है। इस सूक्त में २७ नक्षत्रों का गणना दी गयी है। वेद से
प्रेरणा पाकर लगध मुनि ने वेदांग ज्योतिष की रचना की जिसके श्लोक ऋग्-
ज्योतिष और यजुः-ज्योतिष् नाम से मिलते हैं। लगध का काल ६०० ईसा से पूर्व
माना जाता है। ज्योतिष् के लिए एक और शब्द काल-विधान-शास्त्र (यजुः-ज्योतिष्
३) है। "गणित" शब्द का भी प्रयोग इसी अर्थ में लगध ने किया है, और वेदांग के
इस अंग की महिमा इस प्रकार व्यक्त की है—