सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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= - ३६७६ × ˙६२५१
= - ˙२४८७
∴ भूभा की मोक्षकालिक क्रान्ति = १४°२४' दक्षिण
इसलिए कोज्या उ च स = भूछाया की क्रान्ति - चन्द्रमा की क्रान्ति / मानैक्य खंड
= - १४°२७'˙३ - ( - १४°३१'˙४) / ६०˙६३
= + ४˙१ / ६०˙६३ = + ˙०६७६
∴ उ च स = ८६°७'
अर्थात् चन्द्र बिम्ब के उत्तर विन्दु से ८६°७' पूर्व की ओर ग्रहण का स्पर्श
होगा ।
कोज्या ऊचाम = क्रा - क / मानैक्य खंड
= - १४°२४' - ( - १४°२') / ६०˙६३
= - २२' / ६०˙६३ = - ˙३६२६
यह मान ऋणात्मक है । इसलिए ऊचा म कोण ६०° से अधिक है इसलिए जिस
कोण की कोटिज्या ˙३६२६ है उसको १८० से घटाने पर ऊचाम का मान निकलेगा ।
कोटि ज्या ६८°४३' = ˙३६२६
∴ ऊ चा म = १८०° - ६८°४३' = १११°१७'
अर्थात् चन्द्र विम्ब के उत्तर विन्दु से १११°१७' पश्चिम की ओर ग्रहण का
मोक्ष होगा । नाविक पंचांग के अनुसार ग्रहण का स्पर्श उत्तर विन्दु से ८४° पूर्व
और मोक्ष उत्तर विन्दु से ११०° पच्छिम बतलाया गया है । इस अंतर का कारण
यह है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार क्रान्ति निकालने की रीति कुछ स्थूल है ।
चन्द्रग्रहण का परिलेख खींचने की रीति बतलाने के बाद विचार था कि
संक्षेप में अर्वाचीन रीति से सूर्यग्रहण की गणना की रीति जिसे बेसेलियन रीति
कहते हैं लिखूँ परन्तु इस समय दो पुस्तकों के १ अभाव से तथा कई विघ्न-बाधाओं
१. इन पुस्तकों के नाम (१) Chauvenet's Manual of Spherical and
Practical Astronomy Vol. I और (2) Loomi's Introduction to Practical
Astronomy हैं । पहली पुस्तक में यह विषय बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।
यह दोनों पुस्तकें इलाहाबाद की पब्लिक लाइब्रेरी में हैं परन्तु इस समय वार्षिक
निरीक्षण के कारण अप्राप्य हैं ।