सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठम अध्याय
परिलेखाधिकार
(संक्षिप्त वर्णन)
[ श्लोक १—परिलेख का प्रयोजन । श्लोक २-१२—स्पर्श, मोक्ष और
मध्यकाल के ग्रहणों का परिलेख खींचने की रीति । श्लोक १३—कितना भाग
ग्रस्त होने पर ग्रहण देखना सम्भव है । श्लोक १४-१६—ग्राहक का मार्ग खींचने की
रीति । श्लोक १७-१८—किसी इष्टकाल में ग्रहण का परिलेख खींचने की रीति ।
श्लोक २०-२१—सर्वग्रास ग्रहण के आरंभ काल का परिलेख खींचने की श्लोक
२२—सर्वग्रास ग्रहण के अंतकाल का परिलेख खींचने की रीति । श्लोक २३-किस
प्रकार के चंद्रग्रहण में चन्द्रमा का रंग काला, भूरा, इत्यादि होता है । श्लोक २४—
परिलेख खींचने की रीति किसको बतलानी चाहिए ।]
इस अध्याय का नाम किसी-किसी प्रति में छेद्यकाधिकार भी है। दोनों का
अर्थ एक है । छेद्यक की तुलना में परिलेख सरल है, इसलिए यहाँ परिलेखाधिकार
ही लिखा गया है ।
प्रयोजन —
न छेद्यकमृते यस्मात्क्षेपा ग्रहणयोः स्फुटाः ।
ज्ञायन्ते यत्प्रवक्ष्यामि छेद्यकज्ञानमुत्तमम् ॥१॥
अनुवाद—(१) छेद्यक, परिलेख या चित्र के बिना सूर्य और चन्द्रमा के
ग्रहणों के भेद का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता कि विम्ब की किस दिशा से ग्रहण का
आरंभ, किस दिशा से मोक्ष तथा कितना ग्रास होगा । इसलिए छेद्यक बनाने का
उत्तम ज्ञान मैं कहता हूँ ।
परिलेख खींचने की रीति—
सुसाधितायामवनौ विन्दुं दत्वा ततो लिखेत् ।
सप्तवर्गाङ्गुलेनादौ मण्डलं वलनाश्रितम् ॥२॥
ग्राह्यग्राहकयोगार्धं सम्मितेन द्वितीयकम् ।
मण्डलं तत्समानाख्यं ग्राह्यार्धेन तृतीयकम् ॥३॥
याम्योत्तरा प्राच्यपरा साधनं पूर्ववद् दिशाम् ।
प्रागिन्दोर्ग्रहणं पश्चान्मोक्षोऽर्कस्य विपर्ययात् ॥४॥