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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 838 में से

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पृष्ठ 494

चन्द्रग्रहणाधिकार ४६६
६० / (चा - रा) × √[ ( (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
यदि (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ को मानैक्यखंड लिखा जाय और
इस सूत्र को सरल किया जाय तो यह रूप होगा—
स्थित्यर्ध = (६० घड़ी × √( (मानैक्यखंड + शर) (मानैक्यखंड - शर) )) / (चन्द्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर)
इसी प्रकार
चा फ = √( चा छ² - छ फ² )
= √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
इसलिए विमर्दार्ध काल
= ६० / (चा - रा) × √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
यदि (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ को मानान्तरखंड लिखा जाय और इस सूत्र को
सरल किया जाय तो
विमर्दार्ध = (६० घड़ी × √( (मानान्तर खंड + शर) (मानान्तर खंड - शर) )) / (चंद्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर)
इनके सरल करने पर जो समय आवेगा वह घड़ियों में होगा। परन्तु यह
स्थूल होगा क्योंकि इसकी गणना में सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट दैनिक गतियों का
अन्तर तथा पर्वान्तकालीन चन्द्रशर लिये गये हैं जो स्पर्श या सम्मीलनकाल की स्पष्ट
गतियों और शर से बहुत भिन्न होंगे। इसलिए आवश्यक यह है कि पर्वान्तकाल के
कुछ पहले और पीछे की प्रत्येक घड़ी या घंटे की स्पष्ट गतियों का अन्तर और चन्द्र-
शर निकाल कर गणना की जाय। यदि ऊपर के नियम से ही स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध
काल जाना जावें तो चाहिए कि पर्वान्त काल से इतना पहले के सूर्य, चन्द्रमा, राहु
और चन्द्र शर के स्पष्ट स्थान निकाल कर इनसे फिर स्थित्यर्ध काल और निमर्दार्ध
काल जाना जावे। ये पहले की अपेक्षा अधिक शुद्ध होंगे। इसी प्रकार कई बार
स्थित्यर्ध काल और विमर्दार्ध काल निकाले जायें तो अंत में ऐसा फल मिलेगा जो
फिर भिन्न न हो सकेगा। यही शुद्ध स्थित्यर्धकाल और विमर्दार्ध काल होंगे ऐसी
क्रिया को असकृत्कर्म कहते हैं। इसी की रीति अगले दो श्लोकों में बतलायी गयी है।