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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 838 में से

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पृष्ठ 485

४६० सूर्य-सिद्धान्त

क च रेखा पर क का, छ छा के समान काट लो और का से क ख के समान
और समानान्तर का खा खींचो, च खा को मिलाकर खा की ओर क्रान्तिवृत्त के व
बिन्दु तक खींचो । यही च खा व चन्द्रमा का आपेक्षिक मार्ग होगा, यदि यह मान
लिया जाय कि भूछाया छ बिन्दु पर स्थिर है ।
यदि छ से च ब पर छ फ लम्ब डाला जाय तो यही चन्द्रमा और भूछाया के
केन्द्रों की निकटतम दूरी होगी । यदि छ को केन्द्र मानकर म के समान त्रिज्या से वृत्त
खींचा जाय जो च ब को दो बिन्दुओं स, सा पर काटे तो यही दो बिन्दु आपेक्षिक
मार्ग पर चन्द्रमा के स्पर्श और मोक्षकाल के स्थान होंगे । यदि इन पर बिन्दुओं से च क
के समानान्तर रेखाएँ खींची जायँ तो ये चन्द्रमा के यथार्थ मार्ग के जिन बिन्दुओं पर
पहुँचेंगी वही स्पर्श और मोक्षकाल के यथार्थ स्थान होंगे ।
यदि क च ख कोण को इ और का च खा कोण को ई मान लिया जाय तो
स्परे इ = $\frac{क ख}{क च} = \frac{शा}{चा}$
स्परे ई = $\frac{का खा}{का च} = \frac{क ख}{का च} = \frac{शा}{क च - क का} = \frac{शा}{चा - रा}$
कोण च छ फ और छ च फ का योग समकोण के समान है क्योंकि च ब पर
छ फलम्ब खींचा गया है परन्तु छ च फ और फ च क कोणों का योग भी समकोण के
समान है क्योंकि चछ छप पर लम्ब है और च क, छ प के समानान्तर है ।
इसलिए कोण च छ फ = कोण फ च क = ई,
$\because$ छ फ = च छ कोज्या ई = श कोज्या ई
यदि श कोज्या ई का मान भूछाया और चंद्रमा के व्यासार्धों के योग से अधिक
होगा तो ग्रहण नहीं लगेगा ।
परन्तु यदि श कोज्या ई, म से छोटा होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा । यदि
यह जानना हो कि खंड ग्रहण लगेगा या सर्वग्रास तो दोनों का अंतर निकालना
चाहिये । यदि म — श कोज्या ई का मान चन्द्रमा के व्यास से छोटा. हो तो समझना
चाहिये कि खंड ग्रहण लगेगा और यदि इसका मान चन्द्रमा के व्यास से बड़ा हो तो
सर्वग्रास ग्रहण लगेगा क्योंकि चित्र ६६ से प्रकट है कि म — श कोज्या ई = चन्द्रमा का
ग्रसित भाग । इसलिए यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास से कम होगा तो स्पष्ट है
कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लग सकता । परन्तु यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास के
अधिक है जो सर्वग्रास ग्रहण अवश्य लगेगा ।