सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४४७
पृथ्वी की सामान्य स्पर्शरेखाओं रा पा और री पी से ही पृथ्वी की छाया बनती है
जिसकी नोक न है। सूर्य और पृथ्वी की त्रिज्याएँ र रा और प पा स्पर्शरेखा रा पा
के समकोण पर हैं। प रि रेखा पा रा के समानान्तर है।
पहले यह जानना आवश्यक है कि कोण स प छ किसके समान है क्योकि
यह कोण पृथ्वी के केन्द्र पर छाया की उस त्रिज्या से बनता है जो चंद्रमा की कक्षा
में है इसलिए इससे चंद्रकक्षा में छाया के आकार का पता चलेगा।
∠ रि प र = रि र / प र = (रा र - रा रि) / प र = (रा र - पा प) / प र = (रा र / प र) - (पा प / प र)
= सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन
= त्र - ल
त्र और ल से सूर्य की त्रिज्या और लंबन सूचित किये गये हैं।
∠ स प छ = ∠ प स पा - ∠ प न पा
= ∠ प स पा - ∠ रि प र
क्योंकि प रि और न पा रा समान्तर हैं और न प र दोनों को काटता है।
यहाँ ∠ प स पा = प पा / प स = चंद्रमा का लंबन = ला
ला को चंद्रमा का परम लंबन या क्षितिज लंबन मान लेने में बहुत अंतर
नहीं पड़ेगा। इसलिए
∠ स प छ = ला - (त्र - ल)
= ल + ला - त्र
इससे यह सिद्ध हुआ कि यदि सूर्य और चन्द्रमा के क्षितिज लम्बनों के योगफल
से सूर्य की त्रिज्या का कोणात्मक मान घटा दिया जाय तो जो कुछ शेष रहता है उसी
के समान चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या का कोणात्मक मान होता है।
इसी को भूभाद्र्ध भी कहते हैं।
अनुभव से जाना गया है कि पृथ्वी के वातावरण के कारण इसकी छाया
उपर्युक्त गणितसिद्ध छाया से १/५० गुणा बड़ी होती है क्योंकि ऊपर के गणित में पृथ्वी
के केवल ठोस पिंड का विचार किया है, इसके वातावरण का नहीं।
उदाहरण- यदि सूर्य का लंबन ६'', चन्द्रमा का लंबन ५८' १'' और सूर्य
त्रिज्या १६' १३'' हो तो चंद्रकक्षा में पृथ्वी की छाया की त्रिज्या बतलाओ ?
भूभाद्र्ध = ल + ला - त्र
= ६'' + ५८' १'' - १६' १३''