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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 838 में से

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पृष्ठ 40

मध्यमाधिकार १७
इस सिद्धान्त के अनुसार यह मानना पड़ेगा कि ग्रहों की दूरी और उनके भगण-
काल में एक विशेष सम्बन्ध है। जो ग्रह जितना ही दूर है उसका भगण काल
(चक्कर लगाने का समय) उतना ही अधिक है। यह सम्बन्ध यहाँ बहुत संक्षेप में
बतला दिया जाता है। इसकी पूरी व्याख्या भारतीय तथा पाश्चात्य ज्योतिषियों के
सिद्धान्तों की तुलना करते हुए भूगोलाध्याय नामक बारहवें अध्याय में की जायगी।
जब सभी ग्रहों की रेखात्मक गतियाँ समान मान ली जायं तब यह सहज ही
सिद्ध हो सकता है कि ग्रहों की दूरियों का परस्पर सम्बन्ध क्या है; क्योंकि यह जानना
तो कुछ कठिन नहीं है कि कौन ग्रह कितने दिन में एक चक्कर लगा लेता है। जब
यह मालूम हो गया कि शनि एक चक्कर स्थूल रीति से ३० वर्ष में लगाता है और
सूर्य १ वर्ष में और दोनों की रेखात्मक गतियाँ समान हैं तब यह स्वयंसिद्ध है कि सूर्य
की कक्षा की ३० गुनी शनि की कक्षा है; क्योंकि ३० वर्ष में सूर्य अपनी कक्षा का
३० गुना चलता है और शनि अपनी कक्षा को केवल एक ही बार पूरा कर पाता है।
इसलिए शनि की कक्षा = ३० × सूर्य की कक्षा । अर्थात् पृथ्वी से शनि की दूरी,
सूर्य की दूरी की ३० गुनी है । इसी प्रकार और ग्रहों की दूरी भी जानी जा
सकती है।
आजकल की गवेषणाओं से जाना गया है कि ग्रहों की परस्पर दूरियों का सम्बन्ध
इतना सरल नहीं है और न इनकी रेखात्मक गति ही समान है। अब तो यह सिद्ध
होता है कि पृथ्वी से जितनी सूर्य की दूरी है उसका लगभग १० गुना शनि पृथ्वी से
दूर है।
विकलानां कला षष्ट्या तत् षष्ट्या भाग उच्यते ।
तत्त्रिंशता भवेद्राशिः भगणो द्वादशैव ते ॥ २८ ॥
अनुवाद- ६० विकलाओं की एक कला, ६० कलाओं का एक भाग या अंश,
३० भागों या अंशों की एक राशि तथा १२ राशियों का एक भगण होता है ॥२८॥
विज्ञान भाष्य - यह कोण नापने की इकाइयां हैं । पूरे नक्षत्रचक्र को भगण
कहते हैं। यदि इस चक्कर के १२ समान भाग किये जायं तो प्रत्येक भाग को राशि
कहते हैं। राशि के तीसवें भाग को अंश, अंश के साठवें भाग को कला तथा कला के
साठवें भाग को विकला कहते हैं। इनमें से भगण और राशि का प्रयोग तो केवल
उस आकाश-स्थित चक्र के लिए होता है जिसके तल (plane) में सूर्य पृथ्वी की
परिक्रमा करता हुआ देख पड़ता है और अन्य ग्रह इधर उधर कुछ हटकर परिक्रमा
करते हैं। परन्तु अंश, कला और विकला का प्रयोग अन्य कोणों के नापने में भी
किया जाता है । आजकल अंश को संक्षेप में लिखने की रीति यह है कि अंश का
परिमाण बतलाने वाले अंक के ऊपर तनिक-सा दाहिने हटकर एक छोटा-सा वृत्त
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