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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 838 में से

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पृष्ठ 365

३४२ सूर्य-सिद्धान्त
जब काल समीकरण धनात्मक होता है तब जोड़ा जाता है और ऋणात्मक
होता है तब घटाया जाता है ।
काल समीकरण का निश्चय करना—
अब यह सिद्ध हो गया कि उपर्युक्त कल्पित सूर्य के विषुवांश और स्पष्ट
सूर्य के विषुवांश के अन्तर को ही काल-समीकरण कहते हैं। इसलिए काल-समीकरण
जानने का गुरु नीचे लिखी रीति के अनुसार सहज ही निकल सकता है :—
पृष्ठ ३०२-३०३ में दिखाया गया है कि
विषुवांश की स्पर्शरेखा = परम क्रान्ति कोटि ज्या / सायन भोगांश की कोटि स्पर्शरेखा
यदि विषुवांश को सूचित करने के लिए व, परम क्रान्ति के लिए क और
स्पष्ट सायन भोगांश के लिए भ मान लिये जायें तो
स्परे व = कोटिज्या क × १ / कोस्परे भ
= कोटिज्या क × स्परे भ (१)
यह समीकरण उसी रूप में है जिस रूप में स्पष्ट केन्द्र और उत्केन्द्र का सम्बन्ध
सूचित करनेवाला समीकरण है [देखो पृष्ठ १६४ समीकरण (३)] । इसलिए इस
समीकरण का भी विस्तार १६४-१६८ पृष्ठों में लिखी गयी रीति के अनुसार हो
सकता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि
२ व = २ भ + २ (— स्परे² क/२ ज्या २ भ + १/२ स्परे⁴ क/२ ज्या ४भ
— १/३ स्परे⁶ क/२ ज्या ६ भ + ······)
अथवा
व — भ = — स्परे² क/२ ज्या २ भ + १/२ स्परे⁴ क/२ ज्या ४ भ — १/३ स्परे⁶
क/२ ज्या ६ + ··· (२)
यहां — स्परे² क/२ = १ — कोज्या क / १ + कोज्या क = कोज्या क — १ / कोज्या क + १
इसलिए जैसे पृष्ठ १६७ में प का मान निश्चित किया गया है उसी प्रकार
यहाँ — स्परे² क/२ का मान आया है।
समीकरण (२) के प्रत्येक पद चापीय मानों (radian) में हैं (देखो पृष्ठ
१६२)। इसलिए यदि हम इसके दाहिने पक्ष को ३४३७.७५ से गुणा कर दें तो