सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३०७
$\because$ सायन वृष के उदयासु $= ३४६६ - १६७५$
$= १७६४$
और मिथुन के उदयासु $= ५४०० - ३४६६$
$= १६३१$
नेपियर के पहले नियम के आधार पर सायन मेष के उदयासु इस समीकरण
से भी ज्ञात हो सकते हैं।
विषुवांश की स्पर्शरेखा $= \frac{कोज्या २३^\circ २७'}{कोस्परे ३०^\circ}$
$= \frac{.६१७५}{१.७३२१}$
$= .५२६७$
$\because$ विषुवांश $= २७^\circ १४'.५ = १६७४.५$
$\because$ सायन मेष के उदयासु $= १६७४.५$
सायनमेष और वृष के विषुवांश की स्पर्शरेखा
$= \frac{कोज्या २३^\circ २७'}{कोस्परे ६०^\circ}$
$= \frac{.६१७५}{.५७७४} = १.५८६०$
$\because$ विषुवांश $= ५७^\circ ४६'$
$\because$ सायनवृष के उदयासु $= ३४४६ - १६७४.५$
$= १७६४.५$
परन्तु उन कोणों या धनुओं की स्पर्शरेखाओं के मान सूक्ष्मतापूर्वक नहीं
निकल सकते जो ६०° से अधिक हैं इसलिए यह रीति व्यापक नहीं है।
इस प्रकार लंका में मेषादि तीन सायन राशियों के उदयकाल यह हुए :-
| सायन राशियां | प्राचीन रीति से: असुओं में | प्राचीन रीति से: पलों में | प्राचीन रीति से: मिनटों में | नवीन बेधों के अनुसार: असुओं में | नवीन बेधों के अनुसार: पलों में | नवीन बेधों के अनुसार: मिनटों में |
|---|---|---|---|---|---|---|
| मेष | १६७० | २७८ | १११ | १६७५ | २७६ | १११.७ |
| वृष | १७६५ | २६६ | १२० | १७६४ | २६६ | ११६.६ |
| मिथुन | १६३५ | ३२३ | १२६ | १६३१ | ३२२ | १२८.७ |