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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 838 में से

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पृष्ठ 322

. त्रिप्रश्नाधिकार २६६
बनाओ । फिर सूर्य जिस राशि में हो उसका पद बनाकर सायन भोग का निश्चय
(१७-१६) श्लोकों के अनुसार करो ।
विज्ञान भाष्य—इसका सारांश यह है :—
कर्णाग्रा × लम्बज्या / छायाकर्ण = क्रान्ति ज्या
क्रान्तिज्या × त्रिज्या / परमापक्रम ज्या = सूर्य का सायन भोगांश ज्या
पहले नियम में इष्टकाल की अग्रा (कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा) से सूर्य की
क्रान्ति जानने की रीति बतलायी गया है जो २७वें और २२वें श्लोकों का विलोम
रूप है [देखो २७वें श्लोक का समीकरण (४)]
दूसरा नियम जिससे क्रान्ति जानकर सूर्य का सायन भोगांश निकाला जाता
है इसी अध्याय के १७-१६ श्लोकों में तथा स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोकों में आ
गया है । इसलिए यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं है ।
छाया की नोक जिस मार्ग पर चलता है वह खींचना—
इष्टे हि मध्ये प्राक्पश्चाद् वृत्ते बाहुत्रयान्तरे ॥४१॥
मत्स्यद्वयान्तरयुते स्त्रिसृक्सूत्रेण भाभ्रमः ।
अनुवाद—जिस दिन शंकु की छाया की नोक का मार्ग खींचना हो उस दिन
मध्याह्न के पहले और पीछे छाया की नोक के तीन बिन्दु निश्चित करो । पहले और
दूसरे तथा दूसरे और तीसरे बिन्दुओं से तिमि बनाओ । प्रत्येक तिमि के सामान्य
बिंदुओं पर जाती हुई रेखाओं को इतना बढ़ाओ कि वे मिल जायें । जिस बिन्दु पर
मिलें उसको केन्द्र मानकर छाया की नोक के तीनों बिन्दुओं पर जाती हुई एक
परिधि खींचो । बस यही परिधिखंड छाया की नोक का मार्ग भाभ्रम रेखा उस दिन
होगा ।
विज्ञान भाष्य – यथार्थ में छाया की नोक का मार्ग वृत्ताकार नहीं होता
वरन् अतिपरवलय (hyperbola) के आकार का होता है । इसलिए यह नियम
अशुद्ध है जिसको भास्कराचार्य, रंगनाथ जी इत्यादि सभी ने स्वीकार किया है ।
इसलिए इस पर बहुत विचार करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती ।
लंका और इष्ट स्थान में सायन मेषादि राशियों के उदयकाल
जानने की रीति—
त्रिभद्यकर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ॥४२॥
क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक् ।