सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

मध्यमाधिकार ६
दिव्यदिन—पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर देवताओं के रहने का तथा दक्षिणी
ध्रुव पर राक्षसों के रहने का स्थान बतलाया गया है। इसलिए उत्तरी ध्रुव को देव-
लोक तथा दक्षिणी ध्रुव को असुरलोक कहते हैं। जिस समय सूर्य विषुववृत्त पर
आता है उस समय दिन और रात समान होते हैं। यह घटना वर्ष में केवल दो
बार होती है। ६ महीने तक सूर्य विषुववृत्त के उत्तर तथा ६ महीने तक
दक्षिण रहता है। पहली छमाही में उत्तर गोल में दिन बड़ा और रात
छोटी तथा दक्षिण गोल में दिन छोटा और रात बड़ी होती है। दूसरी छमाही
में ठीक इसका उलटा होता है। परन्तु जब सूर्य विषुववृत्त के उत्तर रहता है तब
वह उत्तरी ध्रुव पर (सुमेरु पर्वत पर) ६ महीने तक सदा दिखाई देता है और दक्षिणी
ध्रुव पर इस समय में नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए इस छमाही को देवताओं का
दिन तथा राक्षसों की रात कहते हैं। जब सूर्य ६ महीने तक विषुववृत्त के दखिन
रहता है तब उत्तरी ध्रुव पर देवताओं को नहीं देख पड़ता और राक्षसों को ६ महीने
तक दक्षिणी ध्रुव पर बराबर देख पड़ता है। इसलिए इस छमाही को देवताओं की
रात और असुरों का दिन कहा गया है। इसलिए हमारे १२ महीने देवताओं अथवा
राक्षसों के एक अहोरात्र के समान होते हैं।
सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् ।
षट् षष्टिसङ्गुणं दिव्यं वर्षमासुरमेव च ॥१४॥
अनुवाद—जो देवताओं का दिन होता है वही असुरों की रात होती है और
जो देवताओं की रात होती है वह असुरों का दिन कहलाता है। यही देवता या असुर
के अहोरात्र का ६० × ६ गुना दिव्य या असुर वर्ष कहलाता है।
विज्ञान भाष्य—जैसे ३६० सावन दिन के एक सावन वर्ष की कल्पना की
गयी है उसी प्रकार ३६० दिव्य दिन का एक दिव्य वर्ष माना गया है। इसका सीधा
अर्थ यह हुआ कि हमारे ३६० वर्षों का देवताओं का एक वर्ष होता है।
तद्द्वादशसहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् ।
सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः ॥१५॥
सन्ध्यासन्ध्यांशसहितं विज्ञेयं तच्चतुर्युगम् ।
कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्मपादव्यवस्थया ॥१६॥
युगस्य दशमो भागः चतुस्त्रिद्वयेक सङ्गुणः ।
क्रमात्कृतयुगादीनां षष्ठांशः सन्ध्ययोः स्वकः ॥१७॥
अनुवाद—इन बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग होता है जिसकी
संख्या सौर वर्षों में तैंतालीस लाख बीस हजार (४३२००००) होती है। इसमें संध्या
और संध्यांश के वर्ष भी मिले हुए हैं। एक चतुर्युग में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और