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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६ सूर्य सिद्धान्त
कहलाती हैं और त्रुटि से लेकर प्राण के नीचे की इकाइयों को अमूर्त कहते हैं । ६
प्राणों की एक विनाड़ी (पल) तथा ६० विनाड़ियों की एक नाड़ी (घड़ी) होती
है ॥ ११ ॥ ६० नाड़ियों का एक नाक्षत्र अहोरात्र (दिन रात का एक जोड़ा) तथा
३० नाक्षत्र अहोरात्रों का एक नाक्षत्र मास होता है । इसी प्रकार ३० सावन दिनों का
एक सावन मास होता है ॥ १२ ॥ उसी प्रकार ३० चान्द्र तिथियों का एक चान्द्रमास
तथा एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौरमास कहते हैं । १२ मासों
का एक वर्ष होता है; जिसको* दिव्यदिन अथवा देवताओं का दिन कहते हैं ।
विज्ञान भाष्य—स्वस्थ मनुष्य सुख से बैठा हुआ हो तो जितने समय में वह
सहज ही हवा (प्राण वायु) भीतर खींचता और बाहर निकालता है उस समय को
प्राण कहते हैं । यही सबसे छोटी इकाई है, जो उस समय नापी जा सकती थी ।
इससे कम समय के नापने का कोई साधन उस समय नहीं था; इसलिए उसको अमूर्त
कहते थे । अब ऐसी घड़ियां बनायी जाती हैं जिनसे उस इकाई का भी नापना सहज है
जो अमूर्त कही गयी हैं । एक नाक्षत्र दिन में ६० घड़ी = ६० × ६० पल =
६० × ६० × ६० प्राण अथवा २१६०० प्राण होते हैं । इसी तरह १ दिन में २४
घंटे = २४ × ६० मिनट = २४ × ६० × ६० सेकंड अथवा ८६४०० सेकंड होते हैं ।
इसलिए १ प्राण में ४ सेकंड होते हैं । जिस घड़ी में सेकंड जानने की सुई लगी रहती
है उससे सेकंड का नापना कितना सहज है, यह सबको विदित है । ऐसी घड़ियां भी
हैं जिनसे १ सेकंड का पांचवां अथवा दसवां भाग सहज ही जाना जा सकता है ।
परन्तु १ सेकंड का दसवां भाग १ प्राण के चालीसवें भाग के समान है । इसलिए
आजकल प्राण के नीचे की कुछ इकाइयाँ भी मूर्त कही जा सकती हैं ।
प्राण को असु भी कहते हैं । प्रसिद्ध ज्योतिषी भास्कराचार्य जी सिद्धान्त-
शिरोमणि में प्राण की दूसरी परिभाषा छन्द-शास्त्र के शब्दों में यों देते हैं— एक गुरु
अक्षर के उच्चारण करने में जितना समय लगता है उसके दस गुने समय को प्राण
कहते हैं । सानुस्वार, विसर्गान्त, दीर्घ और जिस लघु अक्षर के पीछे कोई संयुक्ताक्षर
हो उसको गुरु अक्षर कहते हैं ।
पल तोलने की एक इकाई का भी नाम है, जो चार तोले के समान होता है ।
*इस शब्द से यह प्रकट होता है कि जिन १२ मासों का वर्ष होता है वह सौर-
मास हैं । चांद्र, नाक्षत्र अथवा सावन मासों का वर्ष नहीं होता है ।