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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 838 में से

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पृष्ठ 279

२५६ सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—(१३) शंकु और उसकी छाया (यहाँ पलभा) को अलग-अलग
त्रिज्या अर्थात् ३४३८ से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग दे देने
पर क्रम से लम्बज्या और अक्षज्या आ जायेंगी जिनके धनु क्रम से लम्बांश और
अक्षांश होंगे । (उत्तर गोल में) ये सदा दक्षिण होते हैं ।
विज्ञान भाष्य—इस श्लोक का सार यह है :—
शंकु × त्रिज्या
लम्बज्या = ───────────
विषुवत्कर्ण
पलभा × त्रिज्या
अक्षज्या = ───────────
विषुवत्कर्ण
सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में १२ अंगुल शंकु का
जो छायाकर्ण होता है वही विषुवत्कर्ण, पलकर्ण या अक्षकर्ण कहलाता है । पृष्ठ २०४
के चित्र ४१ में क ग विषुवत्कर्ण है । इसलिए
विषुवत्कर्ण = √(पलभा² + शंकु²)
पृष्ठ ५५ के चित्र ७ और पृष्ठ ५६ के चित्र १० में यह बतलाया गया है कि
किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश क्या हैं । इन चित्रों से यह भी प्रकट होता है
कि किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश दोनों मिलकर ९०° के समान होते हैं ।
पृष्ठ २०४ में चित्र ४१ के सम्बन्ध में यह भी कहा गया है कि विषुवत्कर्ण और शंकु
के बीच का कोण ख क ग अक्षांश है । इसलिए यह सिद्ध है कि विषुवत्कर्ण और
पलभा के बीच का कोण क ग ख लम्बांश हुआ, क्योंकि < ख क ग और < क ग ख
दोनों पूरक कोण हैं ।
इसलिए लम्बज्या या लम्बांश की ज्या
क ख शंकु
= ─── = ────────── आजकल की प्रथानुसार (दशमलव भिन्न में)
क ग विषुवत्कर्ण
शंकु × त्रिज्या
= ─────────── हमारे सिद्धान्तों के अनुसार (कलाओं में)
विषुवत्कर्ण
लम्बांश की ज्या को अक्षांश की कोटिज्या भी कहते हैं क्योंकि लम्बांश और
अक्षांश का योग ९०° होता है । इसी तरह अक्षज्या या अक्षांश की ज्या
ख ग पलभा
= ─── = ────────── (दशमलव भिन्न में)
क ग विषुवत्कर्ण
अथवा पलभा × त्रिज्या
──────────── (कलाओं में)
विषुवत्कर्ण

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