सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

२०८ सूर्य-सिद्धान्त
द्युज्या = व क = ल श = श वि - वि ल
= त्रिज्या - क्रान्ति की उत्क्रम ज्या (२)
यही ६०वें श्लोक का अर्थ है। दाहिने पक्ष का मान क्रान्ति-कोटि ज्या के
समान है,
∴ द्युज्या = क्रान्ति-कोटि ज्या
त्रिभुज क श प में,
क श = व ल = क्रान्ति ज्या
∠ क श प = श स्थान का अक्षांश
∴ अक्षांश स्पर्शरेखा = क प / क श = क्षिति ज्या / क्रान्ति ज्या (३)
परन्तु ऊपर समीकरण (१) में बतलाया गया है कि
अक्षांश स्पर्शरेखा = पलभा / १२
∴ पलभा / १२ = क्षितिज्या / क्रान्तिज्या
अर्थात् क्षिति ज्या = क्रान्तिज्या × पलभा / १२ (४)
परन्तु ध प चा और ध क श दोनों व क और वि श पर लम्ब हैं इसलिए
क प और व क का परस्पर जो सम्बन्ध है वही चा श और श वि का भी है,
अर्थात् —
व क : क प : : वि श : श चा
या श चा = क प × वि श / व क
= क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या
चा श को चरज्या भी कहते हैं, इसलिए
चरज्या = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या (५)
समीकरण (४) और (५) से ६१वें श्लोक का नियम सिद्ध होता है।
चरज्या का कलात्मक धनु चर प्राण कहलाता है।