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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 838 में से

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पृष्ठ 227

२०४ सूर्य-सिद्धान्त
क्रान्तिज्या विषुवद्भाघ्ना क्षितिज्या द्वादशोद्धृता ।
त्रिज्यागुणा होरात्रार्धकर्णप्ता चरजासवः ॥६१॥
अनुवाद—(६०) ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति की ज्या और उत्क्रम ज्या दोनों
जानकर उत्क्रम ज्या को त्रिज्या अर्थात् ३४३८ कला में से घटा दे तो अहोरात्र-वृत्त
का व्यासार्द्ध निकल आता है । इसको द्युज्या भी कहते हैं। यदि क्रान्ति दक्षिण हो
तो अहोरात्र वृत्त का व्यासार्ध दक्षिण होता है और यदि क्रान्ति उत्तर होती है तो
उत्तर होता है । (६१) क्रान्ति ज्या को पलभा से गुणा करके १२ से भाग देने पर
क्षितिज्या आती है जिसको त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्र-वृत्त के व्यासार्ध से भाग
देने पर जो लब्धि आती है उसे चरज्या कहते हैं । चरज्या के धनु की कला को
चर प्राण कहते हैं ।
विज्ञान भाष्य—इन दो श्लोकों में त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय का
सार भरा हुआ है इसलिए इनमें जो पारिभाषिक शब्द आये हैं उनका विस्तृत विवेचन
उसी अध्याय में मिलेगा । परन्तु इन दो श्लोकों का अर्थ समझने के लिए यह आवश्यक
है कि पारिभाषिक शब्दों तथा कुछ अन्य बातों की संक्षेप में चर्चा की जाय ।
पलभा—जिस दिन सूर्य विषुवद् वृत्त पर होता है अर्थात् जिस दिन सूर्य सायन
मेष या सायन तुला बिन्दुओं पर आता है उस दिन समतल भूमि पर सीधे गड़े हुए १२
अंगुल के शंकु की छाया मध्याह्न कालिक
जितनी बड़ी होती है उसी को पलभा क
कहते हैं ।
चित्र ४१ में समतल भूमि के ख
बिन्दु पर क ख शंकु सीधा गड़ा है और
क ख की नाप १२ अंगुल है तो सायन मेष
संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में क ख
की छाया यदि ख ग हो तो ख ग की नाप
को ही ख स्थान की पलभा, विषुवद्भा,
अक्षभा इत्यादि कहेंगे । इस पलभा का
मान सब जगह एक सा नहीं होता वरन्
अक्षांश के अनुसार बढ़ता घटता है ।
विषुवत् रेखा पर जहां अक्षांश शून्य होता
है सायन मेष संक्रान्ति के दिन ख ग का
मान शून्य होता है । विषुवत् रेखा से ज्यों- ख ग
चित्र ४१