सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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१८८ सूर्य-सिद्धान्त
इसलिए ऊपर जो स्थान पात के लिए आया है वह ऋणात्मक है। इसको १२ राशि
में से घटाने पर गुरु के पात का स्थान (भोगांश) साधारण रीति के अनुसार आ
जावेगा। इसलिए गुरु के पात का स्थान = २^रा १६° ४०' २०"†
उपर्युक्त ५६वें श्लोक के अनुसार इसी में दूसरे शीघ्र फल का संस्कार ग्रह
की तरह करना चाहिये। वसंत पंचमी के दिन वृहस्पति का दूसरा शीघ्रफल + १०°
४७' और अंतिम शीघ्र कर्ण ३६०८ है।
इसलिये दूसरा शीघ्रफल संस्कृत पात
= २^रा १६° ४०' २" + १०° ४७'
= ३^रा ०° २७' २"
परंतु गुरु का स्पष्ट स्थान = ६^रा २७° ५३' ३७"
∴ ५७ वें श्लोक के अनुसार पात से गुरु का अंतर
= ६^रा २७° ५३' ३७" - ३^रा ०° २७' २"
= ३^रा २७° २६' ३५"
यही वसंत पंचमी के दिन गुरु का विक्षेप केन्द्र हुआ।
इसी विक्षेप केन्द्र की ज्या को गुरु के मध्यम विक्षेप से जो मध्यमाधिकार के
६६-७० श्लोकों के अनुसार १° या ६०' है गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग
देने पर गुरु का स्पष्ट विक्षेप या शर आ जायगा।
३^रा २७° २६' ३५" दूसरे अर्थात् समपद में है इसलिए इसकी ज्या दूसरे
पाद के गम्य भाग की ज्या के समान होती है।
∴ ज्या ३^रा २७° २६' ३५" = ज्या २^रा २° ३३' २५"
= ज्या ६२° ३३' २५"
= ३०५० कला
˙ गुरु का स्पष्ट शर = (३०५० × ६०) / ३६०८ कला
= ५०' ४३"
विक्षेप केन्द्र १८०° से कम है, इसलिए गुरु क्रान्ति वृत्त से उत्तर है और
५०' ४३" गुरु का उत्तर शर हुआ।
†सूर्य सिद्धान्त-मध्यमाधिकार (विज्ञान परिषद्)