सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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कला है जो ब्रह्मगुप्त से ६० वर्ष बाद हुआ होगा । इस प्रकार यह अपरा सीमा
६२८+६० = ७१८ ईस्वी होती है ।
अंश कला
अश्लेषा १ ०
विशाखा १ ०
अभिजित १ ०
श्रवण २ ०
योग ५ ०
मध्यम १ १५
इस प्रकार यह परिणाम निकाला जा सकता है कि सूर्य-सिद्धान्त की रचना
४०० ई० से लेकर ७२५ ई० तक हुई । बेंटली और बर्जेस ने भी सूर्य-सिद्धान्त में दिये
हुए नक्षत्रों के ध्रुवाङ्कों की तुलना अर्वाचीन ज्योतिर्गणित से सिद्ध ध्रुवांकों से करके
सूर्य-सिद्धान्त का समय निरूपण इसी प्रकार किया है, परन्तु वह इतना ठीक नहीं
जान पड़ता, क्योंकि वेधों के विषय में जिस प्रकार की भूल सूर्य-सिद्धान्तकार ने की
होगी, वैसी ही ब्रह्मगुप्त आदि ने भी की होगी । इस प्रकार रचनाकाल की परा सीमा
इससे अधिक बढ़ायी जा सकती । परन्तु अपरा सीमा ११०० ई० तक आ सकती है
जैसा कि बेंटली ने सिद्ध किया है ।
अयन-चलन की बात से भी बेंटली के मत का समर्थन होता है । भास्करा-
चार्य के समय में सूर्य-सिद्धान्त में लिखित अयन गति उतनी नहीं थी जितनी
वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त में है । इससे जान पड़ता है कि अयन गति का संशोधन
भास्कराचार्य के बाद किया गया है । परन्तु भास्कराचार्य का समय ११५० ई० है ।
सूर्य-सिद्धान्त का लेखक—यह दिखलाया जा चुका है कि सूर्य-सिद्धान्त के
ध्रुवाङ्क यूनानी ज्योतिषी हिपार्कस, टालमी या अन्य पाश्चात्य देशों के ज्योतिषियों
के ध्रुवाङ्कों से नहीं मिलते । इसलिये यह ग्रन्थ उन लोगों के वेधों के आधार पर
नहीं लिखा गया । इसकी परम्परा विवस्वान् अर्थात् सूर्य से बतलायी गयी है (देखो
मध्यमाधिकार श्लोक ८-६) जिस प्रकार भगवद्गीता में बतलाये हुए योग मार्ग की
परम्परा बतलायी गयी है (देखो भगवद्गीता अध्याय ४ श्लोक १-२) । मयासुर
विदेशी नहीं है । उसने भारत का निवासी होकर यह ज्ञान प्राप्त किया था और
उसी से ऋषियों ने भी पीछे सीखा । यही सूर्य-सिद्धान्त में दी हुई कथा का रहस्य
मालूम होता है । ब्रह्मशाप के कारण सूर्य भगवान् का रोमक नगर में उत्पन्न होने
की कथा मनगढ़न्त है और केवल एक या दो हस्त-लिखित पुस्तकों में पायी जाती