सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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यदि समीकरण (च) में उ, ज्या उ, ज्या २ उ, इत्यादि के स्थान पर इनके
मान ऐसे रखे जायँ जिनमें उ न रहे वरन भ, द रहे जो समीकरण (१) से सम्भव है
तो ऐसा समीकरण मिल जायगा जिसमें केवल स, भ और द रहेंगे और जो व्यवहार
के लिए बहुत ही उपयोगी होगा । परन्तु उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि के मान भ
और द में रूप में तभी ज्ञात हो सकते हैं जब लैग्रेंज के सिद्धान्त (Lagrange's
Theorem) के अनुसार उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि का विस्तार किया जाय ।
इसलिए संक्षेप में पहले यह बतलाना चाहिये कि लैग्रेंज का सिद्धान्त क्या है । यह
सिद्धान्त म० म० सुधाकर द्विवेदी के चलन कलन पृष्ठ १०७, ११० में तथा विलियम-
सन के 'डिफरेंशल कैलकुलस' पृष्ठ १५१-१५३ में दिया हुआ है । इस सिद्धान्त का
रूप यह है :-
यदि र = ह + य. फ (र) ऐसा समीकरण हो जिसमें ह और य स्वतंत्र राशि
हों और फ (र) ऐसा फलन (function) हों जो र के मान पर आश्रित हो तो र
का कोई अन्य फलन
फि (र) = फि (ह) + य. फ (ह). फि' (ह)
- य^२ / |२ . ता / ताह { [फ(ह)]^२ फि' (ह) }
- य^३ / |३ . ता^२ / ता ह^२ { [फ(ह)]^३ फि' (ह) } + ......
- य^न / |न . ता^(न-१) / ता(ह)^(न-१) { [फ(ह)]^न फि' (ह) } +...
यहाँ फि' (ह), फि (ह) का पहला तात्कालिक सम्बन्ध dy / dx है, तथा ता / ताह,
ता^२ / ताह^२, ता^३ / ताह^३ इत्यादि आगे कोष्ठों में लिखे हुए पदों के पहले, दूसरे, तीसरे
तात्कालिक सम्बन्ध हैं ।
समीकरण (१) का रूप है,
भ.द = उ - च ज्या उ
वा उ = भ.द + च ज्या उ
= म + च ज्या उ, जहाँ म = भद ।
जो उसी रूप में है जिस रूप में
र = ह + य. फ (र)
जहाँ र, ह और य क्रमानुसार उ, म और च के समान हैं ।