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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १६१
परिधि की त्रिज्या के अनुसार छोटा बड़ा होता है । इसी तरह वक्र गति के आरम्भ
और अन्त के लिए भी शीघ्र केन्द्र का मान घटता बढ़ता है ।
यहाँ तक तो भारतीय रीति से ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की रीति बतलायी
गयी । भास्कराचार्य तथा अन्य कई आचार्यों ने एक और रीति भी बतलायी है जिससे
ग्रहों का स्पष्ट स्थान ठीक इसी प्रकार निकलता है परन्तु वह विस्तार के भय से नहीं
लिखी गयी है । अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि नवीन पद्धति के अनुसार
पाश्चात्य देशों के ज्योतिषी ग्रहों के स्पष्ट स्थान कैसे निकालते हैं ।
केपलर के नियम के अनुसार किसी ग्रह का स्पष्ट स्थान जानने के लिए
पहले यह देखना पड़ता है कि ग्रह अपने कक्षा-वृत्त में जो दीर्घवृत्त के आकार का
होता है और जिसकी नाभि पर सूर्य स्वयम् होता है, कहाँ है । फिर यह जानना पड़ता
है कि उस समय वह ग्रह पृथ्वी से कहाँ देख पड़ेगा ।
चित्र ३२
मान लो अ ग आ किसी ग्रह का दीर्घवृत्तकार कक्षावृत्त है और र, ग्रह के
आकर्षक रवि का स्थान है जो दीर्घवृत्त की नाभि पर है । जिस समय ग्रह सूर्य से
निकटतम अंतर पर अर्थात् अ पर हो उसी समय से ग्रह के भगण काल का आरम्भ
माना जाय और उस समय से 'द' दिन के अन्तर पर ग्रह ग स्थान पर देख पड़े तो
अ र ग कोण ग्रह का मंद केन्द्र कहलाता है जिसे आगे स अक्षर से सूचित किया
जायगा ।
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