सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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∵ प्रथम संस्कृत मंद फल = १६४७ × १६१२ / २१६०० [श्लोक ३६]
= १७२'
यह ऋणात्मक है, क्योंकि मंद केन्द्र चौथे पद में है; इसका आधा, चिह्न
उलटने से + ८६' होगा । नियम (२) के अनुसार,
दूसरा संस्कृत मंदकेन्द्र = १०^रा २६°१२' + ८६'
= १०^रा २७°३८'
इसका मंदफल दूसरा संस्कृत मंदफल होगा ।
अब १०^रा २७°३८' चौथे पद में हैं, जिसका १^रा २७°३८' गत और
१^रा २°२२' गम्य है ।
१^रा २°२२' = ३२°२२' = ३२ × ६० + २२ कला
= १६४२' = ८ पिंड + १४२'
८ वें पिंड की ज्या = १७१६
६ वें पिंड की ज्या = १६१०
अंतर = १६१'
२२५' : १४२' : : १६१ : अभीष्ट अंतर
∴ अभीष्ट अंतर = (१४२ × १६१) / २२५ = १२१'
∴ मन्द भुजज्या = १७१६ + १२१ = १८४०'
∴ मन्द स्फुट परिधि = ३३° - (१° × १८४०) / ३४३८
= ३३° - ३२'
= १६४८'
∵ दूसरा संस्कृत मन्द फल = (१६४८ × १८४०) / २१६००
= १६६' = २°४६' (१)
यह भी ऋणात्मक है। इसलिए इसका चिह्न उलट कर, नियम (३) के
अनुसार शीघ्रकेन्द्र में जोड़ देने से संस्कृत शीघ्रकेन्द्र आवेगा ।
इसलिए संस्कृत शीघ्रकेन्द्र = ७८°२०' + २°४६'
= ८१°६'