सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० सूर्य-सिद्धान्त
∴ अभीष्ट अन्तर = २०० x ५१ / २२५ = १३६ / ३ = ४५'
∴ शीघ्र भुजज्या = ३३२१' + ४५' = ३३६६'
११°४०' = ११ x ६० + ४० = ७००'
७०० / २२५ = ३ पिंड + २५'
३रे पिंड की ज्या = ६७१'
४थे पिंड की ज्या = ८६०'
दोनों का अन्तर = २१६
२२५ : २५ : : २१६ : अभीष्ट अंतर
∴ अभीष्ट अन्तर = २५ x २१६ / २२५ = २४'
∴ शीघ्र कोटिज्या = ६७१' + २४' = ६६५' । गुरु की शीघ्र परिधि
विषम पदान्त में ७२° और सम पदान्त में ७०° है, इसलिए दोनों का अंतर २° है
और ३८वें श्लोक के अनुसार
स्फुट शीघ्र परिधि = ७०° + २° x ३३६६ / ३४३८
= ७०° + २° स्वल्पान्तर से
= ७२°
∴ शीघ्र भुजफल = ७२ x ३३६६ / ३६० [श्लोक ३६]
= ६७३'
और शीघ्र कोटिफल = ७२ x ६६५ / ३६०
= १३६'
शीघ्र केन्द्र पहले पद में है इसलिए शीघ्र कोटिफल ४०वें श्लोक के अनुसार
त्रिज्या में जोड़ना चाहिये, इसलिए शीघ्रकर्ण
= √(३४३८ + १३६)² + ६७३² [श्लोक ४१ उत्तरार्ध]
= √३५७७² + ६७३²
= √१, २७, ९४, ६२६ + ४, ५२, ९२६
= √१, ३२, ४७, ८५८
= ३६४०' स्वल्पान्तर से