सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १३१
रवेर्मन्दपरिध्यंशा मानवश्शीतगो रदाः ।
युग्मान्ते विषमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयोः ॥३४॥
युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खाग्निः सुरास्सूर्या नवार्णवाः ।
ओजे द्व्यगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धयः ॥३५॥
कुजादीनां ततश्शीघ्रा युग्मान्तेऽर्थाग्निदस्त्रकाः ।
गुणाग्निचन्द्राः खागाश्च द्विरसाक्षीणि गोऽग्नयः ॥३६॥
ओजान्ते द्वित्रिकयमाः द्विविश्वे यमपर्वताः ।
खर्तुदस्रा वियद्वेदाश्शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः ॥३७॥
अनुवाद—(३४) सम पदों के अंत में सूर्य की मंद परिधि १४° और चन्द्रमा
की ३२° होती है । विषम पदों के अंत में प्रत्येक की मंद परिधि २० कला कम होती
है । (३५) मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की मन्द परिधियाँ समपदों के अन्त में
क्रम से ७५°, ३०°, ३३°, १२° और ४६° तथा विषम पदों के अंत में क्रम से
७२°, २८°, ३२°, ११°, और ४८° होती हैं । (३६) इन पाँच ग्रहों की शीघ्र
परिधियाँ समपदों के अन्त में क्रम से २३५°, १३३°, ७०°, २६२°, और ३६°
तथा (३७) विषमपदों के अंत में २३२°, १३२°, ७२°, २६०° और ४०° होती हैं
जो शीघ्र कर्म के लिए कही गयी हैं ।
[चित्र: उ, स, म, प]
चित्र २६