सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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भी रहा कि इसे भागवत् का रूपान्तर माना जाता रहा और इस रूप में यह ग्रन्थ
अत्यन्त शिथिल और असम्बद्ध दिखाई पड़ता है । 'सूरसागर' का कृष्ण-लीला सम्बन्धी
रूप, जो वास्तविक 'सूरसागर' है, द्वादशस्कंधी रूपरेखा में छिप जाता है । यही कारण
है कि प्रस्तुत संग्रह मे कृष्ण-चरित को ही प्रमुख स्थान दिया गया है । 'सूरसागर' की
यह परम्परा अत्यन्त प्राचीन है इतना निश्चित है ।
महाकवि सूरदास की जीवनी तथा कृति की आलोचना से सम्बद्ध प्रचुर
साहित्य उपलब्ध है, किन्तु सूर की काव्यकला का सच्चा मूल्यांकन अभी नही हुआ
है । इसमे सन्देह नही कि ऐसे सहज कलात्मक रूप में इतनी, रसानुभूति कही भी
अन्यत्र नही मिलती । सहृदय पाठकगण स्वयं रसास्वादन करके इस मत के तथ्य की
परीक्षा कर सकते हैं । 'सूरसागर' वास्तव में 'रससागर' है । आशा है कि प्रस्तुत
चयन के द्वारा सूरदास की कृति का अधिक परिचय हिन्दी के पाठक तथा विद्यार्थी
दोनो ही को सुलभ हो सकेगा । इसके फलस्वरूप वे जो आनन्द प्राप्त करेगे उसी में
मै अपने परिश्रम की सफलता समझूंगा ।
मूल 'सूरसागर सार' के द्वितीय संस्करण के प्रारम्भ में 'महाकवि' सूरदास
तथा उनकी रचनाएँ शीर्षक संक्षिप्त कवि-परिचय बढाया गया था तथा अन्त में दो
उपयोगी परिशिष्ट दिए गए थे । परिशिष्ट (ख) मे आई हुई प्रमुख अंतर्कथाएँ संक्षेप
मे दी गई थी । अन्त मे संकलित पदो की एक पदानुक्रमणी बढ़ा दी गई थी ।
इन दोनों परिशिष्टो के तैयार करने का सम्पूर्ण श्रेय मेरे प्रिय सहयोगी डॉ०
ब्रजेश्वर वर्मा को है । श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी ने पदानुक्रमणी तैयार करने का कष्ट
उठाया था, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ।
प्रस्तुत विशेष संस्करण में समस्त पदो का अनुवाद दिया गया है । इस प्रकार
का प्रयास लगभग पहली वार हुआ है । 'रामचरितमानस' के सैकडो सटीक संस्करण
उपलब्ध हैं जिनके कारण उस ग्रंथ के समझने में पाठको को बहुत सहायता मिलती
है । 'सूरसागर सटीक' न मिलने के कारण उसके अनेक स्थलो को विद्यार्थी, अध्यापक
तथा सूर-प्रेमी समझ नही पाते है । इस पद संग्रह में इस प्रकार की कठिनाई पाठक
को नही मिलेगी ।
इसका प्रारम्भिक अनुवाद मैंने हिन्दी विभाग के रिसर्चस्कालर श्री विद्याकान्त
तिवारी को रखकर करवाया था । उन्होने पूर्ण परिश्रम के साथ इसे पूरा किया । इसके
उपरान्त मैंने एक-एक अध्याय अपने पुराने शिष्य-सहयोगियो को दिए कि वे अनुवाद
को मूल से मिलाकर ध्यान से देख ले । इसमे मुझे पं० उमाशंकर शुक्ल, श्रीगणेश
प्रसाद, डॉ० रघुवंश, डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ० राजेन्द्र कुमार तथा डॉ०
योगेन्द्र प्रताप सिंह का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ । अन्त मे मैंने सम्पूर्ण अनुवाद
स्वयं देखा और अपने दृष्टिकोण से यत्र-तत्र परिवर्तन किये । जो हो अनुवाद का
अंतिम उत्तरदायित्व मुझ पर है । इतना परिश्रम करने पर भी अनेक स्थल अस्पष्ट