सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—मनुष्य का [सुन्दर] जन्म पाकर तुमने क्या किया ? श्वान और शूकर
की भांति उदरपूर्ति मे ही लगे रहे और [एक क्षण भी] प्रभु का नाम नही लिया । श्री-
मद्भागवत [पुराण] की कथा कानो से नही सुनी तथा [मानव-जन्म के लक्ष्य की प्राप्ति
कराने वाले] गुरु एवं ईश्वर की पहचान नही की । तुम्हारे हृदय मे भाव-भक्ति (ऐसी
भक्ति जिसमे जीवन का स्वरूप बदल जाता है, और सगुण भक्त भगवान् के सेवक, सखा,
स्नेही, माता-पिता या कांता के रूप मे ही आचरण करता है) नही उत्पन्न हुई, [और
तुमने अपना] मन विषयो मे लगाया । तुमने झूठे सुखो को अपना समझा और प्रियतमा
के आलिंगन मे मस्त रहे । हे पापी, तू अपने पापो को सुमेरु के समान बढाते हुए तुम
अन्त मे [उनके सामने] बलहीन हो गये । चौरासी लाख योनियो में भ्रमते रहने [और
उनके कष्ट भोगते रहने] पर भी तुमने इस भ्रमण मे पडे रहने मे ही अपना मन लगाया
(उससे छुटकारे के लिए उद्योग-शील नही हुए) । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के
बिना तुम्हारा जीवन अंजलि-गत जल के समान (प्रतिक्षण) घटता जा रहा है ॥३३॥
इत-उत देखत जनम गयौ ।
या झूठी माया कैँ कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ ।
जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई, अति दुख प्रान सह्यौ ।
वै त्रिभुवनपति विसरि गए तोहिं, सुमिरत क्योँ न रह्यौ ।
श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कवहूँ, बीचहिं भटकि मर्यौ ।
सूरदास कहै, सब जग वूड्यौ, जुग-जुग भक्त तर्यौ ॥३४॥
अर्थ—[सुख की आशा मे इधर-उधर ताकते-ताकते [मेरा] सारा जन्म
[व्यर्थ मे ही] बीत चला । इस झूठी माया के कारण ही मैं दोनो नेत्रो का अन्धा हो
गया । मेरे जन्म के कष्ट से मां को दु खो होना पडा तथा प्राणों को अत्यन्त कष्ट
सहना पडा । [हे मन, झूठी माया मे पडकर] तीनो लोको के स्वामी को तुमने भुला
दिया, उनका स्मरण क्यो नही करते रहे ? तुमने (श्रीमद्भागवत) की कथा कभी नही
सुनी तथा बीच मे (सांसारिक भुलावों मे) ही भटक कर मरते रहे । सूरदास कहते हैं
कि सारा संसार (संसार का प्राणि-समूह) डूबता रहा है, केवल [भगवान् के] भक्त
प्रत्येक युग मे तरते रहे हैं (इस संसार-सागर से पार होते रहे है) ॥३४॥
सबै दिन गए विषय के हेतु ।
तीनौँ पन ऐसौँ ही खोए, केस भए सिर सेत ।
आँखिनि अंध, स्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत ।
गंगा-जल तजि पियत कूप-जल, हरि तजि पूजत प्रेत ।
मन-वच-क्रम जौ भजे स्याम कौं, चारि पदारथ देत ।
ऐसौ प्रभू छोड़ि क्योँ भटकै, अजहूँ चेति अचेत ।
राम नाम विनु क्यों छूटौगे, चंद गहैं ज्यौँ केत ।
सूरदास कछु खरच न लागत, राम नाम मुख लेत ॥३५॥