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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 256 में से

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पृष्ठ 76

षष्ठः सर्गः
तस्य विग्रहदेवोऽभूत् तनयश्चारुविग्रहः ।
निग्रहे वैरिबृन्दानां बहुशो दत्तनिग्रहः ॥ १ ॥
उन भीमदेव के पुत्र सुन्दर शरीरवाले विग्रहदेव हुये जिन्होंने शत्रुओं को युद्ध में कई बार
पराजित किया ॥ १ ॥
पदं पैतामहं तस्मिन्नारोप्य नृपनायकः ।
प्रपेदे पूर्ववंश्यानां पदवीं वार्द्धकोचिताम् ॥ २ ॥
भीमदेव ने उनको पूर्वजों का राज्य सौंप कर पूर्वजों द्वारा वृद्धावस्था में स्वीकृत वानप्रस्थ
आश्रम ग्रहण किया ॥ २ ॥
स्वबलेन विनिर्जित्य गुर्जरान् भृशदुर्जयान् ।
राज्यं तेषां गुणप्राज्यमथ जग्राह विग्रहः ॥ ३ ॥
विग्रहदेव ने अपने पराक्रम और सेना से अत्यन्त दुर्जय गुर्जरों को जीत कर उनके गुणसमृद्ध
राज्य को ले लिया ॥ ३ ॥
यत् पुरं परितो रत्नैः पूरयित्वा प्रजापतिः ।
यानि शिष्टानि तान्येव नीरधौ निदधे ध्रुवम् ॥ ४ ॥
जिन गुर्जरों के नगर को ब्रह्मा जी ने चारों ओर रत्नों से भर कर निश्चय ही बचे-खुचे रत्नों
को समुद्र में फेंका था ॥ ४ ॥
आरात् पारायणे पत्युः शृण्वत्यः श्रुतिसंहिताः ।
यत्र ताः शिक्षयन्ति स्म बहून् पटुगिरः स्त्रियः ॥ ५ ॥
जहाँ वेदपाठी पतियों के समीप वेदों की संहिताओं को सुन कर चतुरवाणी वाली स्त्रियाँ
बहुतों को वेद पढ़ाती थीं ॥ ५ ॥
दधत्यो नखरत्नानि रदनच्छदविद्रुमान् ।
दन्तमुक्ताकलापं च कण्ठकम्बुभिरन्विताः ॥ ६ ॥
पञ्चबाणवणिक्पण्यवीथयो वामलोचनाः ।
यौवनद्रविणैः पुंभिर्यत्रासेव्यन्त सन्ततम् ॥ ७ ॥
जहाँ नख रूपी रत्नों से, अधर रूपी प्रवालों (मूँगों) से, दाँतरूपी मोतियों के समूहों से
और कण्ठ रूपी शंखों से सुसज्जित तिरछे नयनों वाली रमणियाँ कामदेव रूपी जौहरी के बाजार
के समान लगती थीं और यौवन रूपी धन वाले पुरुषों से सदा सेवित थीं ॥ ६-७ ॥
(१) दत्तनिग्रहः कृतपराजयो दत्तदण्डो वा ।