सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

पञ्चमः सर्गः ४५
वेदानुशिष्टे पथि शिष्टजुष्टे नास्त्येव सन्देहलावावतारः ।
फलानुमेयस्य महान् ममायमधर्मराशेरशिवो विवर्तः ॥२७॥
शिष्ट पुरुषों द्वारा आश्रित वेद-प्रतिपादित मार्ग में अणुमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता ।
जो कुछ हो रहा है उससे यही अनुमान होता है कि यह सब मेरे संचित पापों के महान् समूह का
अमंगलकारी परिणाम है ॥२७॥
नूनं ममान्ते रिपवो दुरन्ता निःशङ्कमस्वामिकमस्मदीयम् ।
राष्ट्रं ग्रहीष्यन्ति गिरिप्रदेशं विपन्नपारीन्द्रमिव द्विपेन्द्राः ॥२८॥
हमारे बाद निश्चय ही हमारे उग्र शत्रु निःशंक होकर हमारे स्वामी-हीन इस गिरिप्रदेश
राज्य को छीन लेंगे, जिस प्रकार सिंह के मर जाने पर गिरिप्रदेश पर हाथी ही राज्य करने
लगते हैं ॥२८॥
वृन्दावतीयं कुलराजधानी पाणौ परेषां पतितैव तावत् ।
अतो निवृत्ता भुवि चाहुवाणवंशस्य वार्तापि यशोविलोपात् ॥२९॥
यह हमारी कुल राजधानी वृन्दावती (बूंदी) निश्चय ही शत्रुओं के हाथ में पड़ जायगी ।
यश के लुप्त हो जाने से संसार में अब चौहान वंश की वार्ता भी समाप्त हो जायगी ॥२९॥
स्नेहेन पुत्रप्रतिमं ममापि यवीयसः पुत्रमतो युवानम् ।
राज्येऽभिषेक्ष्यामि समक्षमेव भीमं रिपूणामिह भीमदेवम् ॥३०॥
अतः मैं अब अपने छोटे भाई के पुत्र, शत्रुओं के लिये भयंकर भीमदेव का, जिस पर मेरा भी
पुत्रवत्प्रेम है, अपने सामने ही राज्याभिषेक कर देता हूँ ॥३०॥
निश्चित्य चित्तेन विधेयमेवं बुधोपमः प्रेमवशात् प्रियां ताम् ।
आभाष्य विद्याविशदान् तथान्यानामन्त्र्य मन्त्रिप्रवरांश्च राजा ॥३१॥
दिदेश भीमस्य महाभिषेकसम्भारमाहर्तुमथ स्वभृत्यान् ।
तेऽप्येतदाज्ञानुपदं तदैव सम्पादयामासुरदीर्घसूत्राः ॥३२॥
इस प्रकार मन में निश्चय कर देवताओं के समान (प्रतापी) सिंहराज ने, अपनी महिषी
मनोरमा की प्रेमवश अनुमति प्राप्त कर और अन्य विद्वान् मुख्य मंत्रियों से परामर्श कर, अनुचरों
को भीम के राज्याभिषेक की तैयारी करने की आज्ञा दी । कार्य को अविलम्ब पूर्ण करने में कुशल
अनुचरों ने भी शीघ्र ही इस आज्ञा का पालन किया ॥३१-३२॥
ततः समाहूय समाहितात्मा हिताय वंशस्य पुरोहितांश्च ।
समर्पयामास समः स पित्रा भीमाय धीमान् निजमाधिपत्यम् ॥३३॥
तत्पश्चात् जितेन्द्रिय, बुद्धिमान् और भीम के पिता के समान सिंहराज ने वंश के राजपुरो-
हित को बुला कर अपना राज्य, वंश के हित के लिये, भीमदेव को सौंप दिया ॥३३॥
तत्रातिभूमिङ्गतमस्य दृष्ट्वा निर्वेदमुद्वेगविदीर्णचेताः ।
बाष्पाम्बुपूरं, गुरुवत्सलत्वान् नापारयद् वारयितुं कुमारः ॥३४॥
उस समय सिंहराज के वैराग्य को चरम सीमा पर देख कर कुमार का हृदय शोक-सन्तप्त
हो गया । भारी वात्सल्य के कारण सिंहराज की अश्रुधारा को रोकने में कुमार भीम भी समर्थ
न हो सके ॥३४॥