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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
सरकाते रहने के कारण, सदा अपने कर्तव्य में त्रुटियाँ करती थीं । वे अपने आँसुओं से गीली साड़ी
के वक्षःस्थल से चिपक जाने के कारण प्रकटित आकार वाले स्तनों पर क्षण भर लज्जावश एक
हाथ धर कर (राजा को पंखा न झल कर) दूसरे हाथ में स्थित पंखे को ही अपनी लंबी और गरम
साँसों से पंखा झलने लगीं ॥५-६॥
नितान्तमादर्शमपि प्रसन्नं निश्वासधाराभिरथान्धयन्ती ।
क्लान्ता चिरं काचन मार्जनेन श्यामं दधौ पाणिमिवाननाब्जम् ॥ ७ ॥
खूब चमकते हुये शीशे को भी अपनी गरम साँस से अन्धा (धुंधला) बनाने वाली और कार्य
भार से थकी हुई किसी कुमारी का मुख-कमल भी, माँजने के कारण काले पड़े हुये हाथ के समान,
दुःख से काला पड़ गया ॥ ७ ॥
आदाय ताम्बूलकरण्डमन्या कलङ्कमेवात्मकुलस्य कन्या ।
नालं विमोक्तुं न च वोढुमग्रे व्यग्रा न चक्रे कतमां व्यवस्थाम् ॥ ८ ॥