सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः सर्गः २९
नृत्य-कुशल मयूरों की अत्यन्त मनोहर ‘केका’ ध्वनि सुनाई दे रही है। तथा कहीं ब्राह्मणों के
वेदपाठ की ध्वनि और ‘जय’ ‘जय’ कार के शब्दों की ध्वनि से मिश्रित, श्रद्धा से हाथ जोड़े हुये
जन-समूह के द्वारा भक्तिपूर्वक आनुपूर्वी से पढ़े जाने वाले, श्रुति और स्मृति के पवित्र स्तोत्रों की
ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं अत्यन्त भक्ति के कारण ‘पहले मैं जाऊँ’ ‘पहले मैं जाऊँ’ इस प्रकार
की स्पर्धा से मन्दिर के भीतरी भाग में प्रवेश करने के लिये उद्यत जन-समूह के कोलाहल की ध्वनि
सुनाई दे रही है। कहीं ढोल, शंख, नगाड़े और घंटे आदि के दिशाओं को गूंजा देने वाले शब्द
सुनाई पड़ रहे हैं और कहीं इसी प्रकार के अन्य सुन्दर वाद्यों की ध्वनि सुनाई दे रही है। उपर्युक्त
सब ध्वनियों का एक साथ मिल कर एक विचित्र प्रकार का अनिर्वचनीय घोष सुनाई दे रहा है,
जैसे नाना प्रकार के पुष्पों की सुगन्धियों को एक साथ वहन करने वाले पवन की एक विचित्र
प्रकार की मिश्रित सुगन्ध आती हो ॥४६-५०॥
एवं स शृण्वन् सुनयस्य वाणीं विनीतवेशः प्रविवेश वेश्म ।
पुष्पादि-संभारभृतोऽथ भृत्यास्तमन्वयुः केचन मानवेन्द्रम् ॥५१॥
सुनय के इन वचनों को सुन कर राजा विश्वपति विनीत वेश धारण करके मन्दिर के अन्दर
प्रविष्ट हुये। उनके अनुचर पुष्प आदि पूजा की सामग्री लेकर उनके पीछे पीछे गये ॥५१॥
यथोपचारं स नृपः सपर्यां समाप्य सोमार्धभृतो महिष्याः ।
प्रणम्य सम्यक् स्तुतिपाठगीतैरगात् सदः साधकसत्तमानाम् ॥५२॥
चन्द्रचूड़ शिव की अर्द्धांगिनी भगवती पार्वती की सांगोपांग विधिवत् पूजा समाप्त करके
तथा विधिवत् स्तुतिपाठ करके देवी को प्रणाम कर, विश्वपति साधकों में श्रेष्ठ मुनिवरों
के समाज में गये ॥५२॥
तत्राभिवाद्य प्रथमं मनीषी मनीषितं चाथ निवेद्य तेभ्यः ।
साङ्गं स विद्यां विदुषां प्रसङ्गादासेदिवान् सिद्धिमिवाद्धितीयाम् ॥५३॥
मनीषी राजा ने पहले उनका सादर अभिवादन किया और फिर अपनी इच्छा प्रकट कर
उन विद्वानों से राजा ने सांग विद्या, अद्वितीय सिद्धि के समान, प्राप्त की ॥५३॥
अक्षीणया दक्षिणया स तेषां दाक्षिण्यभाजां प्रथमः प्रमोदम् ।
सम्पाद्य सद्यः प्रतिपद्यते स्म तथानुपूर्व्या विधिमर्हणायाः ॥५४॥
चतुर पुरुषों में अग्रगण्य राजा ने अपनी अक्षीण दक्षिणा से उन विद्वानों को प्रसन्न कर उनसे
आनुपूर्वी सहित अनुष्ठान की विधि प्राप्त की ॥५४॥
अजातरूपाभरणोपि मूर्ध्नि स जातरूपो जनितो जटाभिः ।
विमुक्तवानक्षगुणेषु सङ्गं भृशं बभूवाक्षगुणेषु सक्तः ॥५५॥
यद्यपि राजा के मस्तक पर कोई ‘जातरूपाभरण’ (स्वर्ण के आभूषण) नहीं थे, फिर भी
वे जटाओं से ‘जातरूप’ (सुन्दर) प्रतीत होते थे। उन्होंने ‘अक्ष-गुण’ (चौपड़-पासों के शौक)
का संग छोड़ दिया था, फिर भी ‘अक्ष-गुण’ में (रुद्राक्ष माला फिराने में) अत्यन्त आसक्त थे॥५५॥