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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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सप्तदशः सर्गः १९१
प्रणोदितानां सरयं शराणामन्योन्यसंघट्टभवो हुताशः ।
लग्नः पताकासु ततान दूरादुल्काविकासभ्रममभ्रसीम्नि ॥२१॥
वेग से छोड़े गये बाणों के परस्पर संघर्ष से जो अग्नि उत्पन्न हुई वह पताकाओं में लग कर
आकाश में दूर से ऐसी लगी मानों कोई तारा टूट रहा हो ॥२१॥
नीतं नभः शत्रुशरै र्विलूनं शिरः प्रवीरस्य विरोचते स्म ।
गतं किमु व्योमसदां वधूनां विधूयमानाननचुम्बनाय ॥२२॥
शत्रुओं के बाण से काटा गया और आकाश में उछाला गया किसी वीर का सिर इस प्रकार
शोभित हुआ मानों वह स्वर्ग की अप्सराओं के हिलते हुये मुख को चूमने के लिये गया हो (युद्ध में
काम आने वाले वीरों को वरने के लिये अप्सरायें आती हैं) ॥२२॥
नितान्तनिस्वाद्यतया पिशाचा रक्तं स्रवन्तीमविगाहमानाः ।
अस्रं पपुः पाणितलोपगूढकृत्तेभशुण्डाविवरैर्विदूरात् ॥२३॥
पिशाचगण उस अत्यन्त स्वादिष्ट रक्त को रक्त-नदी में बिना घुसे ही दूर से, हाथियों की
कटी हुई सूंडों के छेदों से पी रहे थे ॥२३॥
आसन्नगाधेऽस्रसरित्प्रवाहे कृत्तद्विपाः कुत्रचिदन्तरौपाः ।
ददर्श येषु स्थितमेत्य कालः क्रव्याशिनां वारिविहारलीलाः ॥२४॥
रक्तासवास्वा[द...] क्रव्याद्वधूगीतसमानकालम् ।
वेतालकान्ता[कर...]कृतानुबन्धान् नटतः कबन्धान् ॥२५॥
उस अगाध प्रवाह वाली रक्त नदी में मरे हुये हाथी टापुओं की तरह लग रहे थे जिन पर
चढ़ कर [साक्षात्] काल मांसभक्षियों की (रक्त-नदी में) जलक्रीड़ायें देख रहा था—पिशाचों की
स्त्रियाँ खून-रक्तमदिरा पीकर मस्त होकर गीत गा रही थीं और वेताल स्त्रियाँ तालियाँ बजा
रही थीं जिनके ताल पर कबन्ध (रुंड) नाच रहे थे ॥२४-२५॥
[मांसा]शया शोणितपङ्करुद्धं मौलिस्थमाणिक्यदलं निगीर्य ।
लग्नं [गले] गाढमथोज्जिगीषुर्व्यग्रा शिवा तीव्रतरं ववाशे ॥२६॥
रुधिर रूपी कीचड़ में सने हुये किसी वीर के शिरोभूषण में जड़े हुये माणिक-समूह को मांस
समझ कर एक गीदड़ी (शृगाली) उसे निगलने लगी, किन्तु वह गले में जाकर गहरा फँस गया
और विचारी गीदड़ी व्याकुल होकर बुरी तरह चिल्लाने लगी ॥२६॥
ततः परं वीक्ष्य विपक्षसैन्यैः पताकिनीं विक्लवितां स्वकीयाम् ।
अवातरद् वातरयं तुरङ्गममारूढवान् शूरजनो रणाय ॥२७॥
इसके बाद अपनी सेना को शत्रु सेनाओं द्वारा व्याकुल देख कर राव सुर्जन पवन के समान
वेगशील घोड़े पर चढ़कर युद्धभूमि में कूद पड़े ॥२७॥
(२६) ववाशे चीञ्चकार ।