सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९ त्रयोदशः सर्गः १४५
एकेनैव कराग्रेण विस्फुरत्तरवारिणा ।
स्थूलतालतरुश्रेणिं तरुणिम्नाप्यनाश्रितः ॥५३॥
बाललीलाविलोलोलं विलुलाव बली बलात् ।
लवं लवं ललोलावं लावं वा वेल्लिवल्ललिम् ॥५४॥
पूर्णतया तरुण न होने पर भी बलवान् और सुन्दर सुर्जन, अपने एक हाथ में चमकती तल-
वार लेकर मोटे-मोटे ताड़ के वृक्षों की श्रेणी को, बाललीला के कारण चपल होकर हठात् कोमल
लता के समान, काट काट कर टुकड़े-टुकड़े कर देते थे ॥५३-५४॥
लीलयाऽपि विनिर्मुक्तास्तेन नवधनुर्भृता ।
अपि शैलशिखाग्राणि पातयामासुराशुगाः ॥५५॥
नवीन धनुर्धारी द्वारा लीला वश छोड़े गये बाण पर्वतों के शिखरों को भी गिरा देते थे ॥५५॥
विदग्धवनिताकूतकलाहस्तावलम्बनम्
उपास्यं पुष्पबाणेन विलासानां रसायनम् ॥५६॥
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