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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 256 में से

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पृष्ठ 162

१३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
वीक्ष्य स्वीयं सैनिकं शीर्यमाणं मत्वा शत्रोः शौर्यमानन्त्यभाजः ।
अध्यारुढः कुञ्जरेन्द्रं नरेन्द्रः प्रायाद् यस्मिन् पारसीकक्षितीशः ॥६७॥
अपनी थोड़ी सी सेना को भी क्षीण होते हुये देख कर और शत्रु की अनन्त सेना को देख कर
हम्मीरदेव, हाथी पर बैठे हुए, उधर गये जिस ओर सुलतान अलाउद्दीन था ॥६७॥
तं तेजोभिः प्रज्वलन्तं दुरन्तैरावव्रुस्ते यौगपद्येन योधाः ।
कल्पापाये क्रूररूपं यथोच्चैर्बिम्बं पूष्णः पुष्कराद्याः पयोदाः ॥६८॥
दुर्धर्ष तेज से प्रज्वलित वीर हम्मीरदेव को शत्रु सैनिकों ने एक साथ उस प्रकार घेर लिया
जिस प्रकार पुष्कर आदि बादल, प्रलय के समय, सूर्य के भयानक तेजस्वी बिम्ब को वेग से
ढक लेते हैं ॥६८॥
तान् दुर्वारान् वारयन् बाणवर्षै म्लेच्छव्रातानब्रवीत् तीव्रकर्मा ।
क्षुद्राः क्षुद्रासन्निभाः केऽत्र यूयं जाग्रत्युग्रे चाहूवाणप्रतापे ॥६९॥
उग्र कर्म में निपुण राजा हम्मीर, उन दुर्धर्ष म्लेच्छों के समूहों को अपने बाणों की वर्षा से
हटाकर, यों बोले—तुच्छ बर्रों के समान (डंक मारने वाले) क्षुद्र पुरुषों ! उग्र प्रतापी चौहाण
के प्रज्वलित रहते तुम क्या कर सकते हो ? ॥६९॥
उलूगखानोलूकमूकोऽत्र भूयः प्रागेव त्वं ज्ञातसारः परोक्षम् ।
क्षुद्रैरेव द्रावितः सङ्क्रान्तात् सौरं तेजः सोढुमेवाक्षमोऽसि ॥७०॥
उल्लू की तरह चुप रहने वाले उलूग खाँ ! तू फिर यहाँ आया है। तेरी शक्ति का पता तो
हमारे परोक्ष में ही लग गया था जब हमारे साधारण सैनिकों ने ही तुझे हरा कर युद्धक्षेत्र से भगा
दिया था। जैसे उल्लू सूर्य का तेज नहीं सह सकता, उसी प्रकार तू भी सूर्यवंशी चौहाण का तेज
नहीं सह सकता ॥७०॥
शंसन्नित्थं सन्निपत्य प्रवीरान् सर्वैरम्भैर्बाधमानानरातीन् ।
अह्नायाऽसौ प्रत्यगृह्णान्नरेन्द्रो नागानन्यान् यूथनाथो यथैकः ॥७१॥
इस प्रकार कह कर वीर हम्मीर ने आगे बढ़कर अपनी शक्ति से वीर शत्रुओं को बाधित
करके उन पर शीघ्र उसी प्रकार आक्रमण किया जिस प्रकार यूथनायक हाथी अकेला ही अन्य
हाथियों पर आक्रमण करता है ॥७१॥
सर्वेष्वेव प्रेषितास्तुल्यकालं चापात्तस्य प्रापतन्तः पृषत्काः ।
स्थूलां मूर्तिं बुद्धिमप्याशु सूक्ष्मां भित्वा मोहं द्विप्रकारं वितेनुः ॥७२॥
हम्मीरदेव के धनुष से छूटे हुये बाण एक साथ सब शत्रुओं पर गिरे और उनके स्थूल शरीर को
तथा सूक्ष्म बुद्धि को भेदकर उन्हें दोनों प्रकार से मूर्च्छित कर दिया ॥७२॥
(६९) क्षुद्राः वरटाः भ्रमर्यः ।