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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 256 में से

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पृष्ठ 147

१६ एकादशः सर्गः १२१
आरोप्यमाणानि तुलां धनानि यथा यथा वृद्धिमवापुरस्य ।
तथा तथा चेतसि वैदिकानां मनोरथा नैव समुद्दिजानाम् ॥४५॥
तुला के दूसरे पलड़े पर चढ़ाये जाने वाले हीरे, मोती, सुवर्ण आदि धन जैसे-जैसे बढ़ते गये
वैसे-वैसे ही वैदिक कर्मकाण्डी ब्राह्मणों के चित्तों में बढ़ने वाले मनोरथ नहीं समाये ॥४५॥
विश्वम्भरोऽस्मिन् निवसन्रजस्रं देहेऽपि तावद् गुरुतां निधत्ताम् ।
भूयिष्ठमित्थं मिलिताः सभायामाशासते स्म क्षितिदेवमुख्याः ॥४६॥
सभा में एकत्रित अनेक ब्राह्मण-श्रेष्ठ यह प्रार्थना कर रहे थे कि विश्वंभर भगवान् विष्णु
जो राजा में निरन्तर निवास करते हैं कृपया इनके शरीर को भी भारी बना दें। (राजा को
भगवान् का अंश माना गया है। अथवा हम्मीर भगवान् के भक्त थे अतः वे निरन्तर उनके
हृदय में निवास करते थे) ॥४६॥
स स्थूललक्षः सुमनास्तदानीं स्थूलं वपुः स्वं बहुमन्यते स्म ।
व्यायामलीलाविभवान् निकामं कुक्षिं कृशं केवलमन्वशोचत् ॥४७॥
दानवीर महात्मा हम्मीर ने उस समय अपने स्थूल शरीर को बहुत अच्छा माना । केवल
व्यायाम करने के कारण पतली कमर के लिये ही उन्हें सोच हुआ ॥४७॥
उच्चैस्तरोऽभून् नृपतिस्तदानीं भरातिनम्रात् किल रत्नराशेः ।
तत्त्वादृगुच्चैःशिरसां जनानामुच्चैःपदारोहणमेव युक्तम् ॥४८॥
उस समय तुला के दूसरे पलड़े के, रत्नसमूह के भार के कारण, नीचे हो जाने से राजा हम्मीर
ऊँचे उठ गये । उन जैसे उन्नत शिर वाले महापुरुषों के लिये उच्च पद प्राप्त करना ठीक ही था॥४८॥
नीता नितम्बस्तनभारभाजा मुदं कृशेनापि शरीरकेण ।
आरोपितास्तत्र तुलां सुरत्नैर्न्या महिष्योऽपि महीश्वरेण ॥४९॥
राजा हम्मीर ने, कृश शरीर होने पर भी नितम्ब और स्तनों के भार के कारण प्रसन्न होने
वाली अन्य रानियों को भी उत्तम रत्नों से तुलवाया ॥४९॥
रत्नानि यत्नेन तुलाधृतानि कुलागतेभ्यः प्रथमं द्विजेभ्यः ।
विभज्य सम्प्राप्तवतो दिगन्तात् सम्भावयामास यथार्हमन्यान् ॥५०॥
तुलादान के उन रत्नों को (एवं मोती, स्वर्ण आदि को) बाँट कर राजा ने पहले कुलपर-
म्परागत ब्राह्मणों का और फिर अन्य देशों से आये हुये ब्राह्मणों का यथोचित संत्कार किया ॥५०॥
शुभौ वसूनामधिपौ तदानीं तुलारूढौ तरणिर्नृपश्च ।
सङ्कोचयामास करं तमोन्धः पूर्वस्तयोर्मुक्तकरः परोऽभूत् ॥५१॥
उस समय वसु (आदित्य देवता; धन) के स्वामी एवं कल्याणकारी, सूर्य और राजा हम्मीर
ये दोनों ही तुला (तुलाराशि ; तराजू) पर अधिरूढ़ हुये । उनमें से प्रथम ने (सूर्य ने) तम (राहु)
(४७) स्थूललक्षः दानशौण्डः ।
(५१) वसूनां देवानां धनानाञ्च । तुलायां तुलाराशौ तुलायाञ्च । तमोऽन्धस्तमसा राहुणा अन्धो ग्रस्तः।