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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

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दशमः सर्गः १०९
निमग्नमेनं व्यसनाम्बुराशौ विलोक्य बन्दी स विदीर्णचेताः
रहः समभ्येत्य समाहितात्मा स्वनामजाती प्रथयाञ्चकार ॥१३४॥
पृथ्वीराज को उस कष्ट-समुद्र में डूबा हुआ देखकर चन्द बरदाई का हृदय फट गया। साव-
धानी से एकान्त में उनके पास जाकर चन्द ने अपना नाम और जाति प्रकट की ॥१३४॥
निरुद्धधैर्यातिशयेन वाष्पप्रवाहमन्याहततीव्रवेगम् ।
कण्ठस्खलद्गद्गदभाषितेन स बोधयामास कथञ्चिदेनम् ॥१३५॥
निरन्तर और तीव्र वेग वाले अश्रु-प्रवाह को अपने अतिशय धैर्य से रोकने का प्रयत्न करते
हुए, गद्गद्कण्ठ से किसी प्रकार चन्द वरदाई ने उनसे यह निवेदन किया ॥१३५॥
योग्यं जगत्यामथवाप्ययोग्यं संभावितं