सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः १०३
तस्योपमानं यदि मानवेषु न वेत्सि रूपेण गुणैश्च तैस्तैः ।
विद्याधरो वा धरणीं विहर्तुं वृन्दारकः कश्चन वाऽवतीर्णः ॥८९॥
और यदि आप यही समझती हैं कि मनुष्यों में कोई भी रूप में और विविध गुणों में पृथ्वीराज
के समान नहीं है, तो हो सकता ह कि यह कोई विद्याधर या कोई देवता पृथ्वी पर विहार करने के
लिये आया हो ॥८९॥
एवं ब्रुवाणां स्मयपूर्वमेनां भूयोऽपि सा सस्मितमाबभाषे ।
प्रत्यक्षदृष्टं किमिमं पदार्थं वितण्डया खण्डयितुं प्रवृत्ता ॥९०॥
इस प्रकार गर्वपूर्वक कहनेवाली सखी से पहली सखी फिर हँस कर बोली, प्रत्यक्ष दिखाइ
देनेवाले पदार्थ को तुम झूठमूठ अपनी वितण्डा से खंडन करने का क्यों प्रयत्न कर
रही हो ? ॥९०॥
प्रतिश्रुतं विष्टपविश्रुतेन पुरो ममाऽत्राऽऽगमनाय येन ।
अभ्यागतो निह्नुतराजलक्ष्मा स क्ष्माधिनाथः किल पक्ष्मलाक्षि ॥९१॥
राजकुमारि ! ये वे ही विश्वविख्यात राजा पृथ्वीराज हैं जिन्होंने मेरे सामने यहाँ आने का
वादा किया था और अब अपना राजसीय वेश छिपा कर छद्मवेश में यहाँ आए हैं ॥९१॥
इत्थं तयोरत्र चिराय वादद्यूतं प्रवृत्तं कुतुकेन सख्योः ।
नृपात्मजा सुन्दर ! सन्दिहाना मां प्राहिणोत् तत्त्वविनिर्णयाय ॥९२॥
'इस प्रकार उन दोनों सखियों में कुतूहलवश बहुत देर तक शर्त के साथ वाद-विवाद चलता
रहा। हे सुन्दर ! तब सन्देह करनेवाली राजकुमारी ने तत्त्वनिर्णय के लिए मुझे यहाँ भेजा ॥९२॥
उदीरयित्वेवमुपात्तमौनां मनाग् विहस्येति बभाण भूपः ।
बाले तवानेन गवेषणेन फलं न किञ्चित् प्रविलोकयामि ॥९३॥
इस प्रकार कहकर मौन हो जाने वाली परिचारिका से राजा ने जरा मुस्कुरा कर कहा,
'बाले ! तुम्हारी इस खोज का मैं कुछ भी फल नहीं देखता ॥९३॥
प्रत्येष्यति त्वद्वचनादियञ्चेत् सन्देग्धि किं बुद्धिमती वचोभिः ।
जनः कुतर्कापहृतप्रतीतिर्नहि प्रमाणीकुरुतेऽन्यवाणीम् ॥९४॥
यदि राजकुमारी तुम्हारे वचनों का विश्वास कर लेगी तो फिर बुद्धिमती होने पर भी वह
सन्देह क्यों करती है ? कुतर्क के कारण जिनका विश्वास डगमगा जाता है वे लोग दूसरे के वचनों
को प्रमाण नहीं मानते ॥९४॥
तां मद्वचोभिर्वद सन्दिहानामागामिनी कामिनि यामनीयम् ।
सनिर्णयं ते हृदयं विधात्री सन्धेहि धैर्यं कियतोपि यामान् ॥९५।
उन सन्देह करनेवाली राजकुमारी से तुम मेरी ओर से कहना कि हे कामिनि ! आगामिनी
रात्रि तुम्हारे सन्देह का निवारण करके तुम्हारे हृदय को निर्णय वाला बना देगी। कुछ पहरों
तक और धैर्यं धारण करो' ॥९५॥