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सर्वकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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दशमः सर्गः ९५
कुण्ठं विवेकाङ्कुशमाशु कृत्वा व्रीडाख्यवारां विघटय्य दूरात् ।
छित्वा तदन्तःस्थितिशृङ्खलाञ्च बभ्राम कन्दर्पमदद्विपेन्द्रः ॥२८॥
कान्तिमती का मदनमद-रूपी मदोत्कट हाथी, विवेक-रूपी अंकुश को कुंठित समझ कर (कुछ
न गिन कर), तथा शीघ्र लज्जा-रूपी बन्धन-स्थान को दूर से ही तोड़-फोड़ कर और पैरों में बँधी
हुई शान्तभाव-रूपी लोह-शृङ्खला को आमूल उखाड़ कर, निरंकुश और उच्छृंखल
घूमने लगा ॥२८॥
मृगीदृशा संसदि सङ्गिनीनां हासप्रसङ्गे विहितं तया यत् ।
शुष्काधरे शीर्णरुचिस्मितं तन् नालं कपोलस्य विकासनाय ॥२९॥
सखी समाज में, हँसी मजाक के प्रसंग में, मृगनयनी कान्तिमती ने अपने सूखे होठों पर जो
दिखावटी मुसकान लाने का यत्न किया, उस मुसकान से उसका गाल भी विकसित न
हो पाया ॥२९॥
कुशेशयाक्षी निशि निःशलाके यदश्रुपूरं विजहौ निषण्णा ।
उच्छूनशोणेक्षणमज्जनेन स्नातं तदावेदयदाननाब्जम् ॥३०॥
कमल-नयनी कान्तिमती रात में एकान्त स्थान में बैठ कर जो आँसुओं की धारा बहाती है
उसे सूजी हुई लाल आँखों के जल में स्नान करने वाला मुख-कमल बतलाता है ॥३०॥
न्यस्तं स्तनान्ते तनुमध्यमाया बलात् सखीभिर्नलिनीपलाशम् ।
तदूष्मणा तत्क्षणमेव शीर्णं निःश्वाससंक्षापवनैर्विकीर्णम् ॥३१॥
पतली कमर वाली कान्तिमती के स्तनों के बीच में सखियों ने जो कमल-पत्र रक्खा वह तत्काल
विरह-ताप से सूख गया और गहरी साँसों के वेग से टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ॥३१॥
मृणालजालं यदि नाम तीव्रतापेन नीयेत न नीलिमानम् ।
निश्चीयतां निश्चलदेहवल्ली कथं नु तस्मिन् मिलिता मृगाक्ष्याः ॥३२॥
कमलपत्रों की सेज यदि विरह के उग्र ताप से मुरझा कर नीली न पड़ जाय तो इसका निश्चय
कैसे हो कि मृगनयनी कान्तिमती की निश्चल देह-लता उस पर सोई थी ? ॥३२॥
निर्बन्धपृष्टाऽपि न सन्दधाति प्रश्नानुरूपोत्तरमातुरा सा ।
बाष्पाम्बुरुद्धार्धपदं कदाचित् स्वयं गृणीते तव नाम तन्वी ॥३३॥
प्रेमपूर्वक कुशल प्रश्न पूछे जाने पर भी व्याकुल कान्तिमती प्रश्नानुकूल उत्तर नहीं दे पाती ।
दुबले-पतले शरीरवाली वह कभी-कभी आपका नाम लेने का प्रयत्न करती है, किन्तु आँसुओं
के जल से कंठ रुँध जाने के कारण आधा नाम ही मुख से निकल पाता है ॥३३॥
ऋज्वी यदीन्दोश्चरमा कला स्याद् यद्युष्णभावं च भजेदभीक्ष्णम् ।
तदा मनोजाग्नितनूकृतायास्तनोरमुष्यास्तुलनामुपैति ॥३४॥
यदि चन्द्रमा की अन्तिम कला सरल (सीधी) हो और सदा उष्ण बनी रहे तो वह कामाग्नि
से तप्त और क्षीण कान्तिमती के शरीर की समानता कर सकती है ॥३४॥
(२८) वारी गजबन्धनस्थानम् ।
(३०) रात्रौ विजने निषण्णया सरोजलोचनया यद् रुदितं तस्मात् तदीय मुखकमलं शोथं प्राप्तयोर्लोहित-
योर्नेत्रयोरश्रुप्रवाहे आत्मानं कृतस्नानं न्यवेदयत् ।