सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

२७३
(२३) वनिक-व्यापारी, जीव । बनजी-व्यापार ईश्वर
भक्ति का । तावडा-सुखदु;ख का । भली वस्तु-ईश्वर भजन,
सत्कर्म । गठरिया बाधी-पुण्य की कमाई की । लेखा-जीवन
का हिसाब । बरी-ब्रह्मरूपी वटवृक्ष । बैल अहकार । पूंजी-
तत्त्वज्ञान की कमाई ।
(२४) पहरायत-पहरेदार व्यवहार बुद्धि । शाह-जीव ।
चोर-वैराग्य बुद्धि या रामनाम । कोतवाल-मन । राजा-
अहकार या जीव । गाव-हृदय या ससार । शोर-प्रशंसा ।
प्रजा-दैवीगुण या मन, प्राण, इन्द्रिय । नगरी-शरीर ।
(२५) राजा-जीवात्मा । विपत्ति-सासारिक तृष्णाएं ।
घर घर-नाना योनि या इन्द्रिया । पाव-शुभाशुभ कर्म
या सकल्प । घोडा-शरीर । बीख-मन की चाल । आक-
इरड-संसार के विषय । सुख-रस । रसभरे ईख-ईश्वर
भक्ति ।
(२६) पानी-ईश्वर प्रेम ; अग्नि-ब्रह्मज्ञान या विरह ।
(२७) खसम-जीव । जोरू-विषयलालसा या
ब्राह्म वृत्ति ।
(२८) पथी-मुमुक्षुजीव, संत पुरुष । पंथ-ज्ञान भक्ति
का मार्ग । निर्भय देश-अद्वैत ब्रह्मस्वरूप । दुष्काल-जन्म-
मरण का चक्कर । सुभिक्ष-अखण्ड ब्रह्मानन्द ।
(२९) अहेरी-मुमुक्षु संत । वन-ससार या शरीर ।
शिकार-मन पर विजय या ब्रह्मप्राप्ति । सिंह व्याघ्र मृग-

२७४
काम क्रोध लोभादि । राजा-राम, परमात्मा । धनुष-ध्यान
या रामनाम । कमर-हृदय । तरकस-बाण, विचार । सावज-
शिकार, मन । जुहार-निवेदन, अर्पण ।
(३०) शुक-ज्ञानी गुरुदेव । कोकिल-कोयल, विचार-
वान पुरुष । सारस-अविवेकी व्यक्ति । हंस-विवेकी जन ।
मुक्ताफल-गूढ, सार अर्थ । मानसरोवर-हृदय । न्हाहि-प्रसन्न
होते है । करक-दोष ।
(३१) द्विज-ब्राह्मण, जीव । भ्रष्टक्रिया-सांसारिक
भोगविलास । ठोर-परमपद, परमानन्द ।

प्रदान की गई छवि पूरी तरह से रिक्त (blank/white) है, इसमें कोई पाठ (text) दिखाई नहीं दे रहा है। कृपया सही या स्पष्ट छवि पुनः अपलोड करें।