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सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary

श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

67
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार
॥१॥
असटपदी ॥
संत कै दूखनि आरजा घटै ॥
संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोइ ॥
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत कृपाल कृपा जे करै ॥
नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥१॥
संत के दूखन ते मुखु भवै ॥
संतन कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संतन कै दूखनि सरप जोनि पाइ ॥

68
संत कै दूखनि तृगद जोनि किरमाइ ॥
संतन कै दूखनि तृसना महि जलै ॥
संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
संत दोखी का थाउ को नाहि ॥
नानक संत भावै ता एइ भी गति पाहि
॥२॥
संत का निंदकु महा अतताई ॥
संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदकु महा हतिआरा ॥
संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदकु राज ते हीनु ॥
संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निंदक कउ सरब रोग ॥
संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥

69
संत की निंदा दोख महि दोखु ॥
नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु
॥३॥
संत का दोखी सदा अपवितु ॥
संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ॥
संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी महा अहंकारी ॥
संत का दोखी सदा बिकारी ॥
संत का दोखी जनमै मरै ॥
संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥
नानक संत भावै ता लड़े मिलाइ ॥४॥
संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥
संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥

70
संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ॥
जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ॥
आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥
नानक संत भावै ता लए उबारि ॥५॥
संत का दोखी इउ बिललाइ ॥
जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ॥
जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ॥
जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत का दोखी धरम ते रहत ॥
संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पड़िआ ॥

71

नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥६॥
संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहकाईऐ ॥
संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ॥
संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न तृसटै कोइ ॥
जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पड़िआ किरतु न मेटै कोइ ॥
नानक जानै सचा सोइ ॥७॥
सभ घट तिस के एहु करनैहारु ॥
सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥
तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥

72

जैसा करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ॥
दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
जिस नो कृपा करै तिसु आपन नामु देइ ॥
बडभागी नानक जन सेइ ॥८॥१३॥
सलोकु ॥
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि
राइ ॥
इक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु
भउ जाइ ॥१॥
असटपदी ॥
मानुख की टेक बृथी सभ जानु ॥
देवन कउ इकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥
बहुरि न तृसना लागै आइ ॥
मारै राखै इको आपि ॥

73
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥१॥
उसतति मन महि करि निरंकार ॥
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंमृतु पीउ ॥
सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥
साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥२॥
बडभागी ते जन जग माहि ॥

74
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ॥
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
इको इकु इकु पछानै ॥
इत उत की एहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥३॥
गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥
तिस की जानहु तृसना बुझै ॥
साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥
सरब रोग ते एहु हरि जनु रहत ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु ॥
गृहसत महि सोई निरबानु ॥
इक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥

75
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥
पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥४॥
जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥
सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥५॥
नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥

76
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
आपे आपि सगल महि आपि ॥
अनिक जुगति रचि थापि उथापि ॥
अबिनासी नाही किछु खंड ॥
धारण धारि रहिए ब्रहमंड ॥
अलख अभेव पुरख परताप ॥
आपि जपाइ त नानक जाप ॥६॥
जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ॥
सगल संसारु उधरै तिन मंत ॥
प्रभ के सेवक सगल उधारन ॥
प्रभ के सेवक दूख बिसारन ॥
आपे मेलि लए किरपाल ॥
गुर का सबदु जपि भए निहाल ॥
उन की सेवा सोई लागै ॥
जिस नो कृपा करहि बडभागै ॥
नामु जपत पावहि बिस्रामु ॥

77
नानक तिन पुरख कउ ऊतम करि मानु
॥७॥
जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ॥
सदा सदा बसै हरि संगि ॥
सहज सुभाइ होवै सो होइ ॥
करणैहारु पछाणै सोइ ॥
प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना ॥
जैसा सा तैसा दृसटाना ॥
जिस ते उपजे तिसु माहि समाइ ॥
एइ सुख निधान उनहू बनि आइ ॥
आपस कउ आपि दीनो मानु ॥
नानक प्रभ जनु इेको जानु ॥८॥१४॥
सलोकु ॥
सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥
जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु
बलिहार ॥१॥

78
असतपदी ॥
टूटी गाढनहार गोपाल ॥
सरब जीआ आपे प्रतिपाल ॥
सगल की चिंता जिसु मन माहि ॥
तिस ते बिरथा कोई नाहि ॥
रे मन मेरे सदा हरि जापि ॥
अबिनासी प्रभु आपे आपि ॥
आपन कीआ कछू न होइ ॥
जे सउ प्रानी लोचै कोइ ॥
तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम ॥
गति नानक जपि इक हरि नाम ॥१॥
रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥
प्रभ की जोति सगल घट सोहै ॥
धनवंता होइ किआ को गरबै ॥
जा सभु किछु तिस का दीआ दरबै ॥
अति सूरा जे कोऊ कहावै ॥

79
प्रभ की कला बिना कह धावै ॥
जे को होइ बहै दातारु ॥
तिसु देनहारु जानै गावारु ॥
जिसु गुर प्रसादि टूटै हउ रोगु ॥
नानक सो जनु सदा अरोगु ॥२॥
जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥
तिउ गुर का सबदु मनहि असथंमनु ॥
जिउ पाखाणु नाव चड़ि तरै ॥
प्राणी गुर चरण लगतु निसतरै ॥
जिउ अंधकार दीपक परगासु ॥
गुर दरसनु देखि मनि होइ बिगासु ॥
जिउ महा उदिआन महि मारगु पावै ॥
तिउ साधू संगि मिलि जोति प्रगटावै ॥
तिन संतन की बाछउ धूरि ॥
नानक की हरि लोचा पूरि ॥३॥
मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥

80
पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
दूख सूख प्रभ देवनहारु ॥
अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥
जो कछु करै सोई सुखु मानु ॥
भूला काहे फिरहि अजान ॥
कउन बसतु आई तेरै संग ॥
लपटि रहिए रसि लोभी पतंग ॥
राम नाम जपि हिरदे माहि ॥
नानक पति सेती घरि जाहि ॥४॥
जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥
राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥
राम नामु हिरदे महि तोलि ॥
लादि खेप संतह संगि चालु ॥
अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥
धंनि धंनि कहै सभु कोइ ॥

81
मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥
इहु वापारु विरला वापारै ॥
नानक ता कै सद बलिहारै ॥५॥
चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥
अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
साध की धूरि करहु इसनानु ॥
साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
साध सेवा वडभागी पाईऐ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
अनिक बिघन ते साधू राखै ॥
हरि गुन गाइ अंमृत रसु चाखै ॥
एट गही संतह दरि आइआ ॥
सरब सूख नानक तिह पाइआ ॥६॥
मिरतक कउ जीवालनहार ॥
भूखे कउ देवत अधार ॥
सरब निधान जा की दृसटी माहि ॥

82
पुरब लिखे का लहणा पाहि ॥
सभु किछु तिस का एहु करनै जोगु ॥
तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ॥
सभ ते ऊच निरमल इह करणी ॥
करि किरपा जिस कउ नामु दीआ ॥
नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥७॥
जा कै मनि गुर की परतीति ॥
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ॥
जा कै हिरदै इको होइ ॥
सचु करणी सचु ता की रहत ॥
सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
साची दृसटि साचा आकारु ॥
सचु वरतै साचा पासारु ॥
पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ॥

83
नानक सो जनु सचि समाता ॥८॥१५॥
सलोकु ॥
रूपु न रेख न रंगु किछु तृहु गुण ते प्रभ
भिन्न ॥
तिसहि बुझाइ नानका जिसु होवै सुप्रसन्न
॥१॥
असटपदी ॥
अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥
मानुख की तू प्रीति तिआगु ॥
तिस ते परै नाही किछु कोइ ॥
सरब निरंतरि इेको सोइ ॥
आपे बीना आपे दाना ॥
गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना ॥
पारब्रहम परमेसुर गोबिंद ॥
कृपा निधान दइिआल बखसंद ॥
साध तेरे की चरनी पाउ ॥

84
नानक कै मनि इहु अनराउ ॥१॥
मनसा पूरन सरना जोग ॥
जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ॥
तिस का मंतु न जानै होरु ॥
अनद रूप मंगल सद जा कै ॥
सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ॥
तप महि तपीसरु गृहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ॥
नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ
॥२॥
जा की लीला की मिति नाहि ॥
सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ॥
सगल परोई अपुनै सूति ॥

85
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ॥
जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥
तिहु गुण महि जा कउ भरमाड़े ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाड़े ॥
ऊच नीच तिस के असथान ॥
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥३॥
नाना रूप नाना जा के रंग ॥
नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ॥
प्रभु अबिनासी इकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ॥
पूरि रहिए पूरनु सभ ठाड़ि ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ॥
अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ॥
जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥४॥

४. अष्टपदी १३-१६: साधु-सत्संग, निन्दक गति व कृपा

86
नाम के धारे सगले जंत ॥
नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ॥
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ॥
नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ॥
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाइे ॥
नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाइे ॥
॥५॥
रूपु सति जा का सति असथानु ॥
पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ॥
सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ॥