सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ / सुदामा-चरित
पथरौटा काठि कौ कठौता कहूं दीसौ नाहिं,
पीतर को लौटा हो कटोरा हौ न बाटकी।
कामरी फटी सी हुती डोंड़न की माला ताक
गोमती की माटी की न सुद्धि कहूं माटकी ॥४०॥
दोहा
जित जित बांमन जात है तित तित के नर नारि ।
पायं गहत हैं बिप्र के बहु पूंछत सुभकारि ॥४१॥
गए हुते द्वारावती मिलिबे जदुकुलराय ।
दीन्हो कह प्रभु नै तुम्हैं हमकों देहु दिखाय ॥४२॥
बिप्र सुदामा को नगर है यह चतुर सुजान ।
करी कृपा यह कृस्न नै दीन्हौं द्विज को दान ॥४३॥
दैखै कहा गुपाल की गुप्तदसा द्विजदीन ।
जौ लौं प्रकट भयो नहीं तौ लों रह्यो मलीन ॥४४॥
हय गयंद रथ पालकी मनिमँत औं पट कोट ।
सहस संख की संपदा द्वारावति लगि छोट ॥४५॥
कवित्त
ढारि कै उठाई बनिआई के तेऊ दिनन,
हिये सूलहू न आई रही तीनि कोने की ।
जहां लगे हीरालाल थारे औ पिटारे रानी,
बैठी तन गोरे बसै थोरी रही जोने की ।
सबसों पुकारत हौं मारत हौं पेट गहि,
बेगि डारौ टारि यह बात नहीं होने की ।
केते घर छोड़ि मो गरीब ही सों बैर कियो,
मेरी मढ़ी ढाहि गढ़ी कौने करी सोने की ॥४६॥