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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रसिद्ध कृति है, जिसे उन्होंने मांडले कारावास के दौरान मराठी में लिखा था। तिलक का मत है कि गीता का मुख्य उपदेश संन्यास नहीं, बल्कि ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मयोग है। इसी दृष्टि से वे गीता की तुलना शंकर, रामानुज आदि आचार्यों के भाष्यों और पश्चिमी नीतिशास्त्र से भी करते हैं।

यह माधवराव सप्रे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद है। मुखपृष्ठ के अनुसार यह बीसवाँ संस्करण है, जो शके १९०४ (सन् १९८२) में तिलक परिवार की ओर से पूना से प्रकाशित हुआ। इसमें गीता की बहिरंग परीक्षा, मूल संस्कृत श्लोक, भाषा-अनुवाद, अर्थ-निर्णायक टिप्पणियाँ और पूर्वी-पश्चिमी मतों की तुलना है। ग्रन्थ पन्द्रह प्रकरणों में है, जिनमें कर्मजिज्ञासा, सुख-दुःख विवेक, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचार, क्षराक्षर विचार, कर्मविपाक, सिद्धावस्था, भक्तिमार्ग और गीता-समन्वय जैसे विषय हैं। परिशिष्ट में गीता के रचनाकाल का विचार और पूरी गीता अनुवाद सहित है।

लगभग ९५६ पृष्ठों का यह ग्रन्थ गीता-दर्शन और भारतीय राष्ट्रीय चिन्तन, दोनों के अध्येताओं के लिए मूल्यवान है।