श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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कर्मजिज्ञासा ४७
है ( मनु. १२. ८९; भाग. ११. १०. १ और ७. १७. ४७ ) क्रोधके विषयमें किरात-
काव्यमें ( १. ३३) भारविका कथन है :-
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ।
“ जिस मनुष्यको अपमानित होनेपरभी क्रोध नहीं आता, उसकी मित्रता और द्वेष
दोनों बराबर हैं ।” क्षात्रधर्मके अनुसार देखा जाय तो विदुलाने यही कहा है :-
एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमौ ।
क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान् ॥
“ जिस मनुष्यको ( अन्यायपर ) क्रोध आता है, जो (अपमान को) सह नहीं सकता,
वही पुरुष कहलाता है । जिस मनुष्यमें क्रोध या चिढ़ नहीं है, वह नपुंसकहीके समान
है ” ( मभा. उ. १३२. ३३ ) । इस बातका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है, कि
इस जगतके व्यवहारके लिये न तो सदा तेज या क्रोधही उपयोगी है, और न क्षमा ।
यही बात लोभके विषयमें कही जा सकती है; क्योंकि संन्यासीकोभी मोक्षकी इच्छा
होती है ।
व्यासजीने महाभारतमें अनेक स्थानोपर भिन्न भिन्न कथाओके द्वारा यह
प्रतिपादन किया है, कि शूरता, धैर्य, दया, शील, मित्रता, समता आदि सब सद्गुण
अपने अपने विरुद्ध गुणोके अतिरिक्त देश-काल आदिसे मर्यादित हैं। यह नहीं
समझना चाहिये, कि कोई एकही सद्गुण सभी समय शोभा देता है । भर्तृहरिका
कथन है :-
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
“ संकटके समय धैर्य, अभ्युदयके समय ( अर्थात् जब शासन करनेकी सामर्थ्य हो
तब ) क्षमा, सभामें वक्तृता और युद्धमें शूरता शोभा देती है ” ( नीति. ६३ ) ।
शांतिके समय ‘उत्तर’के समान बकबक करनेवाले पुरुष कुछ कम नहीं हैं । घर
बैठे बैठे अपनी स्त्रीकी नथनीमेंसे तीर चलानेवाले कर्मवीर बहुतेरे होंगे; पर उनमेंसे
रणभूमिपर धनुर्धर कहलानेवाला एक-आधही दीख पड़ता है । धैर्य आदि सद्गुण
ऊपर लिखे समयपरही शोभा देते हैं, इतनाही नहीं, किंतु ऐसे प्रसंगके बिना उनकी
सच्ची परीक्षाभी नहीं होती । सुखके साथी तो बहुतेरे हुआ करते हैं; परंतु “ निकष-
ग्रावा तु तेषां विपत् ” – विपत्तिही उनकी परीक्षाकी सच्ची कसौटी है। ‘प्रसंग’
शब्दहीमें देश-कालके अतिरिक्त पात्रापात्र आदि बातोंकाभी समावेश हो जाता है ।
समतासे बढ़कर कोईभी गुण श्रेष्ठ नहीं है । भगवद्गीतामें स्पष्ट रीतिसे लिखा है,
“ समः सर्वेषु भूतेषु ” यही सिद्ध पुरुषोंका लक्षण है । परंतु समता कहते किसे हैं ?
यदि कोई मनुष्य योग्यता-अयोग्यताका विचार न करके सब लोगोंको समान
रूपसे दान करने लगे, तो क्या हम उसे अच्छा कहेंगे ? इस प्रश्नका निर्णय भगवद्-
गीताहीमें इस प्रकार किया है – “ देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ” –